भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 122, कुल 405 में से

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पृष्ठ 122

सातवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

मय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्वपोत इतस्ततः ।
भ्रमति स्वान्तवातेन न ममास्त्यसहिष्णुता ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, विश्वपोतः, इतः, भ्रमति, स्वान्तवातेन, न, मम, अस्ति, असहिष्णुता ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मयि अनन्त-महाम्भोधौ =मुझ अनन्त महासमुद्र मेंभ्रमति =भ्रमती है
+ परन्तु =परन्तु
विश्वपोतः =विश्व-रूपी नौकामम =मुझको
स्वान्तवातेन =मन-रूपी पवन करकेअसहिष्णुता =असहनशीलता
इतः ततः =इधर-उधर सेन अस्ति =नहीं है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**यदि लय चिंतन नहीं होगा, तो सांसारिक विक्षेप भी बने रहेंगे और वे कदापि दूर नहीं होंगे ?

**उत्तर—**वे बने रहें, मेरी क्या हानि है । अनन्त महान् समुद्र-रूपी मुझ आत्मा में यह विश्व-रूपी नौका मन-रूपी पवन करके इधर-उधर भ्रमती है, उसका भ्रमण करना मेरे को असहन नहीं है । जैसे समुद्र में पवन करके इधर-उधर