अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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११६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भ्रमती हुई नौका समुद्र को क्षुब्ध नहीं कर सकती है, वैसे मन-रूपी पवन करके इधर-उधर भ्रमती हुई विश्व-रूपी नौका भी समुद्र-रूपी आत्मा को क्षुब्ध नहीं कर सकती है ॥ १ ॥
मूलम् । मय्यनन्तमहाम्भोधौ जगद्वीचिः स्वभावतः । उदेतु वास्तमायातु न मे वृद्धिर्न च क्षतिः ॥ २ ॥
पदच्छेदः । मयि, अनन्तमहाम्भोधौ, जगद्वीचिः, स्वभावतः, उदेतु, वा, अस्तम्, आयातु, न, मे, वृद्धिः, न, च, क्षतिः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| $\left.\begin{aligned} &मयि अनन्त- \ &महाम्भोधौ = \end{aligned}\right}$ | $\left{\begin{aligned} &मुझ अनन्त \ &महासमुद्र में \end{aligned}\right.$ | आयातु = प्राप्त हो | |
| जगद्वीचिः = जगत्-रूपी कल्लोल | मे = मेरी | ||
| स्वभावतः = स्वभाव से | न = न | ||
| उदेतु = उदय हों | वृद्धिः = वृद्धि है | ||
| वा = और चाहे | च = और | ||
| अस्तम् = लय को | न = न | ||
| क्षति = हानि है ॥ |
भावार्थ । पूर्ववाले वाक्य करके जगत् के व्यवहार को अनिष्टता का अभाव कहा । अब इस वाक्य करके जगत् की उत्पत्ति आदिकों को भी अनिष्टता का अभाव कथन करते हैं ।