अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
लूट लावें। तदनुसार सब जुलाहे मिलकर रात्रि को क्षत्रियों के ग्राम को लूटने गये। जब क्षत्रिय लोग हथियार लेकर जुलाहों के मारने को दौड़े, तब जुलाहे सब भागे। उनमें से एक जुलाहे ने कहा कि भाइयो ! भागे तो जाते ही हो, भला मारो-मारो तो कहते चलो। वे सब जुलाहे भागते जाते और मारो-मारो भी कहते जाते थे।
दाष्टान्त में यह है कि बहुत से बनावट के ज्ञानी ज्ञान के साधनों से भागे तो जाते हैं, पर औरों से ऐसा कहते जाते हैं कि वासना को त्यागो, ज्ञान को धारण करो, सब संसार मिथ्या है, ऐसे दम्भी ज्ञानी नहीं हो सकते हैं। जो समग्र वासनाओं से रहित हैं, वे ही ज्ञानी हैं। वासनावाला ही बन्ध को प्राप्त होता है ॥ १ ॥
मूलम् ।
तदामुक्तिर्यदा चित्तं न वाञ्छति न शोचति ।
न मुञ्चति न गृह्णाति न हृष्यति न कुप्यति ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
तदा, मुक्तिः, यदा, चित्तम्, न, वाञ्छति, न, शोचति, न, मुञ्चति, न, गृह्णाति, न, हृष्यति, न, कुप्यति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा= | जब | न हृष्यति= | न प्रसन्न होता है |
| चित्तम्= | मन | + च= | और |
| न वाञ्छति= | न चाहता है | न= | न |
| न शोचति= | न शोचता है | कुप्यति= | दुःखित होता है |
| न मुञ्चति= | न त्यागता है | तदा= | तब भी |
| न गृह्णाति= | न ग्रहण करता है | मुक्तिः= | मुक्ति है ॥ |