भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 405 में से

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पृष्ठ 132

भावार्थ ।

जिस काल में चित्त न भोगों की प्राप्ति की इच्छा करता है, और न शोकों के त्याग की इच्छा करता है, अर्थात् पदार्थ के पाने पर न उसको हर्ष होता है, और न प्यारे सम्बन्धियों के नष्ट या वियोग हो जाने पर शोक होता है, किन्तु एक-रस सदा ज्यों का त्यों बना रहता है, उसी काल में वह पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥

मूलम् ।

तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु ।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

तदा, बन्धः, यदा, चित्तम्, सक्तम्, कासु, अपि, दृष्टिषु,
तदा, मोक्षः, यदा, चित्तम्, असक्तम्, सर्वदृष्टिषु ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा= जबयदा= जब
चित्तम्= मनचित्तम्= मन
कासु= किसीसर्वदृष्टिषु= सब दृष्टियों में अ- र्थात् सब विषयों में से किसी भी विषय में
दृष्टिषु= दृष्टि में अर्थात् विषय मेंअसक्तम्= नहीं
सक्तम्= लगा हुआ हैतदा= तब
तदा= तबमोक्षः= मुक्त है ॥
बन्धः= बन्ध है
अपि= और
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