अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
भावार्थ ।
जिस काल में चित्त न भोगों की प्राप्ति की इच्छा करता है, और न शोकों के त्याग की इच्छा करता है, अर्थात् पदार्थ के पाने पर न उसको हर्ष होता है, और न प्यारे सम्बन्धियों के नष्ट या वियोग हो जाने पर शोक होता है, किन्तु एक-रस सदा ज्यों का त्यों बना रहता है, उसी काल में वह पुरुष मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ २ ॥
मूलम् ।
तदा बन्धो यदा चित्तं सक्तं कास्वपि दृष्टिषु ।
तदा मोक्षो यदा चित्तमसक्तं सर्वदृष्टिषु ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
तदा, बन्धः, यदा, चित्तम्, सक्तम्, कासु, अपि, दृष्टिषु,
तदा, मोक्षः, यदा, चित्तम्, असक्तम्, सर्वदृष्टिषु ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा | = जब | यदा | = जब |
| चित्तम् | = मन | चित्तम् | = मन |
| कासु | = किसी | सर्वदृष्टिषु | = सब दृष्टियों में अ- र्थात् सब विषयों में से किसी भी विषय में |
| दृष्टिषु | = दृष्टि में अर्थात् विषय में | असक्तम् | = नहीं |
| सक्तम् | = लगा हुआ है | तदा | = तब |
| तदा | = तब | मोक्षः | = मुक्त है ॥ |
| बन्धः | = बन्ध है | ||
| अपि | = और |
१२६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
पहले एक वाक्य करके बन्ध के लक्षण को कहा और दूसरे वाक्य करके मुक्ति के लक्षण को कहा । अब एक ही वाक्य करके बन्ध और मोक्ष दोनों का कथन करते हैं—
जब चित्त अनात्मपदार्थों में अनात्माकारवृत्तिवाला होता है, तब भी इसको बन्ध होता है । जब चित्त विषयाकार नहीं होता है अर्थात् आसक्ति से रहित होकर सर्वत्र आत्मदृष्टिवाला होता है, तभी जीव मुक्त कहा जाता है ।
प्रश्न—आपने कहा है कि जिस काल में चित्त विषयों में आसक्त होता है, तब बन्ध होता है और जब अनासक्त होता है, तब मुक्त होता है । यदि एक ही चित्त में काल-भेद करके बन्ध और मोक्ष माना जावेगा, तब मुक्ति भी अनित्य हो जावेगी ?
उत्तर—उस वाक्य का यह तात्पर्य नहीं है, जो आपने समझा है, किन्तु उसका यह तात्पर्य है कि आत्म-ज्ञान की प्राप्ति के पूर्व जितने काल तक पुरुष का चित्त विचार से शून्य होकर विषयों में आसक्त रहता है, उतने काल तक जीव बन्ध में ही पड़ा रहता है । पश्चात् जब विचार करके युक्त हुआ, रचित दोष-दृष्टि करके विषयों में आसक्ति से रहित हो जाता है, और फिर विषय-वासना का बीज भी चित्त में नहीं रहता है, तब फिर वह मुक्त होकर कदापि बन्ध को नहीं प्राप्त होता है । जैसे भुंजे हुए बीज में फिर अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति नहीं रहती है, वैसे ही निर्वासनिक चित्तवाला पुरुष कभी भी जन्म को नहीं प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
आठवाँ प्रकरण । १२७
मूलम् ।
यदा नाहं तदा मोक्षो यदाहं बन्धनं तदा । मत्वेति हेलया किञ्चिन्मा गृहाण विमुञ्च मा ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
यदा, न, अहम्, तदा, मोक्षः, यदा, अहम्, बन्धनम्, तदा, मत्वा, इति, हेलया, किञ्चित्, मा, गृहाण, विमुञ्च, मा ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । अन्वयः । शब्दार्थ । यदा=जब इति=इस प्रकार अहम्=मैं हूँ मत्वा=मान करके तदा=तब हेलया=इच्छा करके बन्धनम्=बन्ध है मा=मत यदा=जब गृहाण=ग्रहण कर अहम् न=मैं नहीं हूँ मा=मत तदा=तब विमुञ्च=त्याग कर ॥ मोक्षः=मोक्ष है
भावार्थ ।
जब तक पुरुष में अहंकार बैठा है—'मैं ब्राह्मण हूँ', 'मैं ज्ञानी हूँ,' 'मैं त्यागी हूँ,' तब तक वह मुक्त कदापि नहीं हो सकता है । ऐसा भी कहा है—
यावत्स्यात्स्वस्य सम्बन्धोऽहंकारेण दुरात्मना । तावन्न लेशमात्रापि मुक्तिवार्ता विलक्षणा ॥ १ ॥
अर्थात् तब तक इस जीव का सम्बन्ध दुरात्मा अहंकारी
१२८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
के साथ बना रहता है, तब तक मुक्ति लेश-मात्र इसको प्राप्त नहीं होती है । इसी वार्ता को कहते हैं— जब तक जीव का शरीरादिकों से अहंकाराध्यास बना है, तब तक इसकी मुक्ति कदापि नहीं हो सकती है । जिस काल में अहंकाराध्यास इसका निवृत्त हो जाता है, उसी काल में बिना ही परिश्रम अकर्ता, अभोक्ता होकर मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायामष्टमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ८ ॥
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नवाँ प्रकरण (निर्वेद / वैराग्य)
नवाँ प्रकरण । —:o:—
मूलम् । कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा । एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती ॥ १ ॥
पदच्छेदः । कृताकृते, च, द्वन्द्वानि, कदा, शान्तानि, कस्य, वा, एवम्, ज्ञात्वा, इह, निर्वेदात्, भव, त्यागपरः अव्रती ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कृताकृते = | { कृत और अकृत कर्म | वा = | संशय रहित |
| च = | और | ज्ञात्वा = | जान करके |
| द्वन्द्वानि = | दुःख और सुख | इह = | इस संसार में |
| कस्य = | किसके | निर्वेदात् = | विचार से |
| कदा = | कब | अव्रती = | { व्रत रहित होता हुआ |
| शान्तानि = | शान्त हुए हैं | त्यागपरः = | त्याग परायण |
| एवम् = | इस प्रकार | भव = | हो ॥ |
भावार्थ ।
अब निर्वेदाष्टक नामक नवम प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं—
पहले शिष्य ने जो गुरु के प्रति अपना अनुभव कहा था, उसकी दृढ़ता के लिये अब आठ श्लोकों करके वैराग्य के स्वरूप को दिखलाते हैं ।
प्रश्न—त्याग कैसे करना चाहिए ?
१३० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
उत्तर— यह मेरे को कर्त्तव्य है, और यह मेरे को कर्त्तव्य नहीं है, इसी का नाम कृत और अकृत है अर्थात् इस तरह का जो आग्रह है अर्थात् अवश्य ही मेरे को यह करना उचित है, और अवश्य ही मेरे को यह करना उचित नहीं है, इन दोनों में अभिनिवेश अर्थात् हठ न करना और द्वन्द्व जो सुख-दुःख हैं, मैं इन दोनों से रहित हो जाऊँ इसमें आग्रह न करना, क्योंकि वे दोनों किसी भी देहधारी के कभी शान्त नहीं हुए हैं और न होवेंगे, इस वास्ते अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! इन कृताऽकृत आदिकों के त्याग से भी तू वैराग्य को प्राप्त हो । क्योंकि हे शिष्य ! तू अव्रती है, तेरा आग्रह याने हठे किसी में भी नहीं है ॥ १ ॥
मूलम् ।
कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात् । जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गता ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
कस्य, अपि, तात, धन्यस्य, लोकचेष्टावलोकनात्, जीवितेच्छा, बुभुक्षा, च, बुभुत्सा, उपशमम्, गता ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| तात = | हे प्रिय | जीवितेच्छा = | जीने की इच्छा |
| लोकचेष्टावलोकनात् = | उत्पत्ति और विनाश- रूप लोकों की चेष्टा के देखने से | च = | और |
| बुभुक्षा = | भोगने की इच्छा | ||
| कस्य = | किसी | च = | और |
| धन्यस्य = | महात्मा का | बुभुत्सा = | ज्ञान की इच्छा |
| अपि = | भी | उपशमम् = | शान्ति को |
| गता = | प्राप्त हुई है ॥ |
नवाँ प्रकरण । १३१
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे शिष्य ! हजारों मनुष्यों में से किसी एक भाग्यशाली पुरुष के चित्त में वैराग्य उत्पन्न होता है । उसके जीने की और भोगने की इच्छा भी निवृत्त हो जाती है । क्योंकि संसार के पदार्थों में ग्लानि और दोष- दृष्टि का नाम ही वैराग्य है । जितने संसार के उत्पत्ति और नाशवाले पदार्थ हैं, सबमें दोष लगे हैं । संसार में स्त्री, पुत्र, धन और शरीर तथा इन्द्रिय आदिक सबको प्यारे हैं, और इन्हीं के सुख के लिये पुरुष अनेक अनर्थों को करता है, और ये ही सब जीवों के बन्ध के कारण हैं, इस वास्ते विना इनमें वैराग्य प्राप्त हुए कदापि मोक्ष को नहीं प्राप्त होता है, इसी हेतु से प्रथम इन्हीं में दोष-दृष्टि को दिखाते हैं । ‘योग- वाशिष्ठ’ में कहा है—
गर्भे दुर्गन्धिभूयिष्ठे जठराग्निप्रदीपिते । दुःखं मयाप्तं यत्तस्मात्कनीयः कुम्भिपाकजम् ॥ १ ॥
अर्थात् बड़ी भारी दुर्गन्धि करके युक्त जो माता का उदर है, और जो जठराग्नि करके प्रदीप्त है, उस गर्भ में आकर जो जीव को दुःख होता है, उससे कुम्भीपाक नरक का भी दुःख कम है ॥ १ ॥
एवं ‘गर्भोपनिषद्’ में भी गर्भ के दुःखोंका वर्णन किया है कि जिस काल में गर्भ में जीव अति दुःखी होता है, तो ईश्वर से प्रार्थना करता है कि हे प्रभो ! इस बार मैं जन्म लेकर अवश्य ही ज्ञान के साधनों को करूँगा, पर जन्म
१३२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
लेकर फिर यह जीव संसार के भोगों में फँस जाता है और गर्भवाले दुःखों को भूल जाता है, इसी कारण फिर बार-बार जन्मता और मरता है । 'शिव-गीता' में मरण के दुःखों को भी दिखाया है—
हा कान्ते हा धनं पुत्राः क्रन्दमानः सुदारुणम् ।
मण्डूक इव सर्पेण मृत्युना गीर्यते नरः ॥ १ ॥
अर्थात् जब जीव प्राणों को त्यागने लगता है, तब पुकारता है हे भार्ये ! हे धन ! हे पुत्रो ! मुझको इस मृत्यु से छुड़ाओ, ऐसे भयानक शब्दों को करता है जैसे सर्प के मुख में पड़ा हुआ मेढक पुकारता है ॥ १ ॥
अयः पाशेन कालस्य स्नेहपाशेन बन्धुभिः ।
आत्मानं कृष्यमाणस्य न खल्वस्ति परायणम् ॥ २ ॥
अर्थात् मरण-काल में यह जीव इधर तो काल के पाशों करके बँधा होता है, उधर सम्बन्धियों के स्नेह की रस्सियों करके खेंचा हुआ होता है, पर कोई भी मृत्यु से इसकी रक्षा नहीं कर सकता है ॥ २ ॥
या माता सा पुनर्भार्या या भार्या जननी हि सा ।
यः पिता स पुनः पुत्रो यः पुत्रः स पुनः पिता ॥ १ ॥
अर्थात् पूर्व जन्म में जो माता होती है, वही पुत्र में स्नेह के कारण उत्तर जन्म में उसकी स्त्री बनती है । जो पूर्व जन्म में पिता होता है, वही उत्तर जन्म में पुत्र होता है । जो पूर्व जन्म में पुत्र होता है, वही उत्तर जन्म में पिता होता है ॥ १ ॥
नवाँ प्रकरण । १३३
एको यदा व्रजति कर्मपुरःसरोऽयं विश्रामवृक्षसदृशः खलु जीवलोकः । सायंसायं वासवृक्षं समेतः प्रातःप्रातस्तेन तेन प्रयान्ति ॥ २ ॥
जैसे सायंकाल में इधर उधर से पक्षी उड़कर एक ही वृक्ष पर रात्रि को विश्राम के लिये इकट्ठे हो जाते हैं और प्रातःकाल में सब इधर उधर उड़ जाते हैं, वैसे ही इस संसार-रूपी वृक्ष में सब जीवकर्मों के वश्य होकर इकट्ठे हो जाते हैं, फिर प्रारब्ध-कर्म के भोग के पूरे होने पर, सब अकेले अकेले होकर चले जाते हैं । कोई भी स्त्री, पुत्र, धनादि इसके साथ नहीं जाते हैं, और न साथ आते हैं, इस तरह विचार करके इनमें मोह को कदापि न करे ।
एवं 'देवी-भागवत' में शुकदेवजी ने जो स्त्री के सम्बन्ध से दोष दिखाये हैं—
नरस्य बन्धनाथाय शृङ्खला स्त्री प्रकीर्त्तिता । लोहबद्धोऽपि मुच्येत स्त्रीबद्धो नैव मुच्यते ॥ १ ॥
पुरुष के बन्धन का हेतु स्त्री को ही बेड़ीरूप करके कहा है। एवं लोहे की बेड़ी करके बाँधा हुआ पुरुष छूट जाता है, परन्तु स्त्री के स्नेह-रूपी पाश करके बाँधा हुआ पुरुष कदापि छूट नहीं सकता है । इसी पर एक दृष्टान्त देते हैं —
एक लड़का बाल्यावस्था में संन्यासी हो गया । जब जवान हुआ, तब तीर्थयात्रा करने को जाता था । रास्ते में
१३४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
उधर से एक बरात आती थी । वह संन्यासी खड़ा हो गया और उसने पूछा, यह क्या है ? लोगों ने कहा, यह बरात है । यह जो लड़का घोड़ी पर सवार है, इसकी शादी एक लड़की से होगी । तब उसने पूछा, फिर क्या होगा, तो कहा, जब इसकी स्त्री इसके घर में आवेगी, तब दोनों आपस में विषयानंद को प्राप्त होवेंगे । फिर स्त्री के लड़के पैदा होवेंगे । इतना सुनकर वह संन्यासी चला गया । रास्ते में एक कुएँ पर छाया में सो रहा तब उसने स्वप्न देखा कि मेरी शादी हुई है, स्त्री आई है और मैं उसके साथ सोया हूँ । उस स्त्री ने कहा, थोड़ा सा पीछे हटो । जब वह हटने लगा, तब वह धम्म से कुएँ में गिर पड़ा । गिरने की आवाज को सुनकर लोग दौड़कर कहने लगे कि किसने तुझको कुएँ में गिरा दिया है ? उसने कहा, स्वप्न की स्त्री ने मेरे को कुएँ में गिरा दिया है, न मालूम जाग्रत् की स्त्री पुरुषों की क्या दुर्दशा करती होगी । तात्पर्य यह है कि विवेकी के लिये स्त्री साक्षात् नरक का कुण्ड है ।
प्रश्न—हे भगवन् ! कर्मकाण्डी कहते हैं कि जिसके पुत्र नहीं है, उसकी गति भी नहीं होती है, इस वास्ते येनकेन उपाय करके पुत्र उत्पन्न करना चाहिए, ऐसा 'देवी-भागवत' में लिखा है ।
उत्तर—हे प्रियदर्शन ! यह जो तुमने कहा है कि अपुत्र की गति नहीं होती है, सो गति शब्द का क्या अर्थ है । गति शब्द का अर्थ मोक्ष करते हो वा दोनों लोकों का सुख करते हो । यदि गति शब्द का अर्थ मोक्ष करो, तब सब पुत्रवालों की मुक्ति होनी चाहिए और मनुष्य, पशु आदिक सभी ज्ञान के
नवाँ प्रकरण । १३५
बिना ही मुक्त हो जावेंगे और शुकदेव, वामदेवादिकों की मुक्ति शास्त्रों में लिखी है, सो न होनी चाहिए, क्योंकि उनके कोई पुत्र नहीं था, इसलिये पुत्र से गति कहनेवाले वाक्य अर्थवाद-रूप हैं। लोगों ने पुत्र के सम्बन्ध से बड़े दुःख उठाये हैं। राजा दशरथ ने रामजी के वियोग में प्राणों को त्याग दिया था। प्रथम तो पुत्र के उत्पन्न होने की चिंता, फिर उसके जीने की चिंता, फिर उसके विवाह और सन्तति की चिन्ता जन्म भर बनी रहती है। बड़े होने पर पिता की वृद्धावस्था में पुत्र धनादिकों को ले लेते हैं, और सेवा आदिकुछ भी नहीं करते हैं, अतएव पुत्र भी विवेकी पुरुष के लिये दुःख के हेतु है। इसी तरह और भी जितने विषय हैं, सो सब दुःख के ही कारण हैं। ‘विवेक-चूड़ामणि’ में कहा है—
विषयाशामहापाशात् यो विमुक्तः सुदुस्त्यजात् ।
स एकः कल्पते मुक्त्ये नान्ये षट्शास्त्रवेदिनः ॥ १ ॥
अर्थात् स्त्री पुत्र धनादिक विषय महान् पाश हैं जिनका त्यागना अति कठिन है। जो पुरुष उन पाशों से रहित है, वही मुक्ति का अधिकारी है। दूसरा षट्शास्त्रों का जाननेवाला पुरुष भी मोक्ष का अधिकारी नहीं है ॥ १ ॥
इसी पर अष्टावक्रजी कहते हैं कि संपूर्ण विषयवासनाओं से रहित संसार में, लाखों में कोई एक ही वैराग्यवान् जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ २ ॥
मूलम् ।
अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रितयदूषितम् ।
असारं निन्दितं हेयमिति निश्चित्य शाम्यति ॥ ३ ॥
१३६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः। अनित्यम्, सर्वम्, एव, इदम्, तापत्रितयदूषितम्, असारम्, निन्दितम्, हेयम्, इति, निश्चित्य, शाम्यति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| इदम् सर्वम्= | यह सब ही | हेयम्= | त्यागने योग्य है |
| अनित्यम्= | अनित्य है | इति= | ऐसा |
| तापत्रितय- | तीनों तापों से | निश्चित्य= | निश्चय करके |
| दूषितम् = | दूषित है | शाम्यति= | { शान्ति को प्राप्त |
| असारम्= | सार-रहित है | { होता है ॥ | |
| निन्दितम्= | निन्दित है |
भावार्थ । प्रश्न-ज्ञानी की सर्वत्र इच्छा के उपशम में क्या कारण है ? उत्तर-जितना कि दृष्टि का विषय-प्रपंच है, वह सब अनित्य है अर्थात् चेतन में अध्यस्त है । प्रश्न-यह प्रपंच कैसा है ? उत्तर-आध्यात्मिक आदि तापों करके दूषित है । वात, पित्त, श्लेष्मादि निमित्त से जो दुःख होता है, उसका नाम आध्यात्मिक दुःख है याने काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्षा, आदि करके जो मानस दुःख है, उसी का नाम आध्यात्मिक दुःख है । और जो मनुष्य, पशु, सर्प, वृक्षादि निमित्तक दुःख है, उसका नाम आधिभौतिक दुःख है । यक्ष, राक्षस, विनायकादि निमित्तक जो दुःख है, उसका नाम आधिदैविक दुःख है । इन तीन प्रकार के दुःखों करके पुरुष सदैव संतप्त रहता है । इसी वास्ते यह सब प्रपंच असार है, तुच्छ है, त्यागने-
नवाँ प्रकरण । १३७
योग्य है, ऐसा जानकर ज्ञानवान् किसी भी पदार्थ की इच्छा नहीं करता है ॥ ३ ॥
मूलम् । काऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम् । तान्युपेक्ष्य यथा प्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥
पदच्छेदः । कः, असौ, कालः, वयः, किम्, वा, यत्र, द्वन्द्वानि, नो, नृणाम्, तानि, उपेक्ष्य, यथा, प्राप्तवर्ती, सिद्धिम्, अवाप्नुयात् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यत्र | = जिसमें | अपि तु न कोऽपि | = { अर्थात् कोई नहीं |
| नृणाम् | = मनुष्यों को | तानि | = उन सबको |
| द्वन्द्वानि नो | = सुख और दुःख न होवे | उपेक्ष्य | = विस्मरण करके |
| असौ | = वह | यथा प्राप्तवर्ती | = { यथा प्राप्त वस्तुओं में वर्तनेवाला पुरुष |
| कः | = कौन | सिद्धिम् | = { सिद्धि अर्थात् मोक्ष को |
| कालः | = काल है | अवाप्नुयात् | = प्राप्त होता है ॥ |
| वा | = और | ||
| किम् | = कौन | ||
| वयः | = अवस्था है |
भावार्थ । पुरुषों को सुख दुःखादिक द्वन्द्व किसी खास काल या अवस्था में नहीं व्यापता है, किन्तु सब अवस्थाओं में और सर्व कालों में सुख-दुःखादिक द्वन्द्व देहधारी को बराबर बने रहते हैं। इसी वार्ता को रामजी ने अध्यात्म-रामायण में कहा है—
१३८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । द्वयमेतद्धि जन्तूनामलंघ्यं दिनरात्रिवत् ॥ १ ॥
सुख के अनन्तर दुःख होता है, और दुःख के अनन्तर सुख होता है; ये दोनों निश्चय करके जीव को अलंघ्य हैं, याने हटाये नहीं जा सकते हैं ॥ १ ॥
सुखमध्ये स्थितं दुःखं दुःखमध्ये स्थितम् सुखम् । द्वयमन्योन्यसंयुक्तं प्रोच्यते जलपंकवत् ॥ २ ॥
सुख में दुःख, और दुःख में सुख स्थित है, अर्थात् क्षण-मात्र सुख के देनेवाले विषयों से अनेक रोगादिक दुःख उत्पन्न होते हैं, और उपवासादिक व्रतों से जिसमें दुःख होता है, फिर विषयों की प्राप्ति-रूपी सुख होता है । ये दोनों सुख दुःख ऐसे मिले हैं, जैसे पानी और कीच मिले होते हैं ॥२॥
किसी भी देहधारी से ये सुख-दुःख किसी काल में त्यागे नहीं जा सकते हैं, इस वास्ते विवेकी पुरुष उन सुख-दुःखा-दिक द्वन्द्वों में भो इच्छा को त्यागकर शरीर को प्रारब्ध आश्रित छोड़ देता है ॥ ४ ॥
मूलम् ।
नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा । दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
नाना, मतम्, महर्षीणाम्, साधूनाम्, योगिनाम्, तथा, दृष्ट्वा, निर्वेदम्, आपन्नः, कः, न, शाम्यति, मानवः ॥
नवाँ प्रकरण । १३९
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| नाना मतम् = | नाना प्रकार के मत हैं | दृष्ट्वा = | देख करके |
| महर्षीणाम् = | महर्षियों के | निर्व्वेदम् = | वैराग्य को |
| तथा = | और | आपन्नः = | प्राप्त हुआ |
| योगिनाम् = | योगियों के | कः मानवः = | कौन पुरुष |
| इति = | ऐसा | न शाम्यति = | नहीं शान्ति को प्राप्त होता है ॥ |
भावार्थ ।
हे शिष्य ! ‘तर्क-शास्त्र’ को, और कर्मकाण्ड में निष्ठा को, त्याग करके केवल आत्म-ज्ञान में ही निष्ठा करना चाहिए । क्योंकि तर्क-शास्त्रादिक सब बुद्धि के भ्रम करने-वाले हैं ।
गौतम आदिकों के जो मत हैं, वे वेद और युक्ति-प्रमाण से विरुद्ध हैं, केवल भ्रम-जाल में डालनेवाले हैं । गौतम आदिकों के मत पर चलनेवाले नैयायिक ईश्वर-आत्मा और जीव-आत्मा, दोनों को जड़ मानते हैं । और ज्ञान, इच्छा आदिकों को आत्मा का गुण मानते हैं । फिर ईश्वरात्मा के गुणों को नित्य मानते हैं । जीवात्मा के गुणों को अनित्य मानते हैं । और सारे जीवात्मा को व्यापक मानते हैं। आत्मा के संयोग को ज्ञान के प्रति कारण मानते हैं। परमाणुओं से जगत् की उत्पत्ति मानते हैं । फिर परमाणुओं को निरवयव मानते हैं ।
प्रथम तो जीवात्मा और ईश्वरात्मा जड़ नहीं हो सकते हैं, क्योंकि—
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म
१४० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
आत्मा सत्य-रूप, ज्ञान-स्वरूप और आनन्द-रूप है। इस श्रुति के साथ विरोध आता है। दूसरा, दोनों ईश्वर आत्मा के जड़ मानने से जगदांध प्रसंग होगा।
यदि यह मान लिया जाय कि कर्म जड़ है, आत्मा जड़ है, ईश्वरात्मा भी जड़ है, तो फिर भोक्ता, कर्ता और फल-प्रदाता कोई भी नहीं होगा। क्योंकि जड़ में भोक्तापना, कर्तापना आदिक शक्ति बनती नहीं, और जड़ के गुण ज्ञान और चेतनता बन नहीं सकते हैं, क्योंकि गुण-गुणी का भेद नहीं होता। जैसे अग्नि और उष्णता; जल और शीतलता का भेद नहीं है। यदि अग्नि से उष्णता और प्रकाश निकाल लिया जाय, तो अग्नि कोई वस्तु बाकी नहीं रहती है, और दोनों जड़ भी है। जैसे अग्नि के स्वरूप उष्ण और प्रकाश हैं वैसे ज्ञान और चेतनता भी दोनों आत्मा के स्वरूप ही हैं, आत्मा के धर्म नहीं हैं। क्योंकि गुण-गुणी भाव आत्मा में कहीं भी नहीं लिखा है। और चेतनता जड़ का धर्म है, इसमें कोई भी दृष्टान्त नहीं मिलता है, इसलिये नैयायिक का कथन असंगत है।
यदि ईश्वर के इच्छादिक गुणों को नित्य माना जाय, तो ईश्वर की इच्छानुसार जगत् की उत्पत्ति अथवा प्रलय सर्वदा हुआ करेगी याने दोनों में से एक ही होगा, दोनों नहीं होवेंगे।
यदि यह माना जाय कि दोनों कभी प्रलय, कभी सृष्टि, तब ईश्वर की इच्छा अनित्य हो जावेगी।
सारे जीवात्मा व्यापक भी नहीं हो सकते हैं, यदि ऐसा
नवाँ प्रकरण । १४१
मानें, तो एक के शरीर में जगत् भर के जीवात्मा बैठे हैं, और सब जीवात्माओं के साथ उसके मन के संयोग बने रहने से उसको सर्वज्ञता होनी चाहिए, इस कारण सबको सर्वज्ञता होनी चाहिए, सो तो होती नहीं है, इसी से सिद्ध होता है कि जीवात्माओं को व्यापक मानना युक्ति-प्रमाण से विरुद्ध है, और परमाणुओं से जड़ जगत् की उत्पत्ति भी नहीं बनती है, क्योंकि निरवयव परमाणुओं का परस्पर संयोग बनता नहीं, सावयव पदार्थों का ही परस्पर संयोग बनता है, युक्ति-प्रमाणों से विरुद्ध होने के कारण नैयायिक का मत विवेकी को त्यागने-योग्य है। इसी तरह कर्म-निष्ठा- वाले कर्मियों के मत में भी विवेकी को श्रद्धा न करनी चाहिए, क्योंकि उनके मत में भी नाना प्रकार के झगड़े लगे हैं। कोई कर्मी होम को ही मुख्य मानते हैं, कोई मन्त्रों के जपादिकों को ही प्रधान मानते हैं, कोई कृच्छ्र चान्द्रायणा- दिक व्रतों के करने को ही धर्म मानते हैं, कोई यज्ञों में पशुओं की हिंसा को ही धर्म मानते हैं, कोई मूर्ति-पूजा को, कोई तीर्थाटन को धर्म मानते हैं। कर्मजाल इतना बड़ा भारी है कि यदि एक आदमी प्रत्येक दिन एक एक कर्म को करे, तब भी उसके सब उमर भर में सारे कर्म समाप्त नहीं होंगे और घटीयन्त्र की तरह अधोध्वं अर्थात् नरक, स्वर्ग का हेतु कर्म-रूपी जाल है। इसी पर कहा है—
कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते । तस्मात्कर्म न कुर्वन्ति यत्तपः पारदर्शिनः ॥ १ ॥
अर्थात् कर्मों करके जीव बन्ध को प्राप्त होता है, और
१४२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
आत्म-विद्या करके वह मोक्ष को प्राप्त होता है, इसलिये विवेकी आत्म-ज्ञानी कर्मों को नहीं करते हैं, किन्तु आत्मा-निष्ठा में ही मग्न रहते हैं ॥ १ ॥
जैमिनि आचार्य का मत भी श्रुति-युक्ति से विरुद्ध है, क्योंकि जैमिनि आत्मा को जड़, चेतन उभय-रूप मानते हैं, और स्वर्ग की प्राप्ति को ही मोक्ष मानते हैं ।
एक ही पदार्थ जड़, चेतन उभय-रूप नहीं हो सकता है । क्योंकि इसमें कोई भी दृष्टान्त नहीं मिलता है । फिर चेतन निरवयव है, और जड़ सावयव और अनित्य है । शीत, उष्ण जैसे परस्पर विरोधी हैं, वैसे ही उभय-रूप जड़, चेतन भी विरोधी हैं । और वेद में भी कहीं आत्मा को उभय-रूपता नहीं लिखी है, और न स्वर्ग की प्राप्ति का नाम भी मोक्ष है ।
तद्यथेह कर्मचितो लोकःक्षीयत एवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते ।
श्रुति कहती है कि जैसे इस लोक में कर्मों करके प्राप्त की हुई खेती काल पा करके नष्ट हो जाती है, वैसे ही पुण्यकर्मों करके प्राप्त हुआ स्वर्ग भी नष्ट हो जाता है । इन श्रुतिवाक्यों से स्वर्ग की अनित्यता सिद्ध होती है । और जब स्वर्ग ही अनित्य है, तो मुक्ति भी अनित्य अवश्य होगी । इस वास्ते जैमिनि का मत आत्म-ज्ञान निष्ठावाले को त्यागना चाहिए ॥ ५ ॥
मूलम् ।
कृत्वा मूर्त्तिपरिज्ञानं चैतन्यस्य न किं गुरुः ।
निर्वेदसमतायुक्त्या यस्तारयति संसृतेः ॥ ६ ॥
नवाँ प्रकरण । १४३
पदच्छेदः ।
कृत्वा, मूर्तिपरिज्ञानम्, चैतन्यस्य, न, किम्, गुरुः, निर्वेदसमता युक्त्या, यः, तारयति, संसृतेः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निर्वेदसमता युक्त्या=$ | वैराग्य, समता और युक्ति द्वारा | संसृतेः = | संसार से |
| चैतन्यस्य = | चैतन्य के | + स्वम् = | अपने को |
| मूर्तिपरिज्ञानम् = | मूर्ति के ज्ञान को | तारयति = | तारता है |
| कृत्वा = | जानकर | किम् = | क्या |
| यः = | जो | सः = | वह |
| गुरुः न = | गुरु नहीं है ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिसने विषय-वासना को त्याग करके शत्रु और मित्र में समबुद्धि करके, और श्रुति के अनुकूल युक्ति से सच्चिदानन्द-रूप अपने आत्मा का साक्षात्कार किया है, और जिसने अपने को ही सर्वरूप से अनुभव किया है, उसने संसार से अपने को तारा है, दूसरा नहीं । हे जनक ! तुम अपने ही पुरुषार्थ से मुक्त होगे, दूसरे करके नहीं होगे ।
प्रश्न— संसार में लोग कहते हैं कि गुरु शिष्य को मुक्त कर देता है । आप उसके विरुद्ध ऐसा कहते हैं कि शिष्य अपने पुरुषार्थ से ही मुक्त होता है, यह क्या बात है ?
उत्तर— हे प्रियदर्शन ! संसार के लोग प्रायः करके अज्ञानी मूर्ख होते हैं, वे शास्त्र के तात्पर्य को और गुरु-शिष्य शब्दों के अर्थ को नहीं जानते हैं । क्योंकि वे कामना करके
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होते हैं। जैसे कि मुसलमानों ने मान रक्खा है कि पैगम्बर हमको पापों से छुड़ा देगा। एवं जैसे ईसाइयों ने मान रक्खा है कि ईसा हमको पापों से छुड़ा देगा वैसे ही और भी संसारी लोगों ने मान रक्खा है कि गुरु हमको पापों से छुड़ा देगा, ऐसा उनका मानना दुःख का जनक है। क्योंकि वेद और शास्त्र में कान में मंत्र फूंकनेवाले को गुरु नहीं लिखा है, किन्तु जो अज्ञान और ज्ञान के कार्य जन्म- मरण-रूपी संसार से आत्म-ज्ञान उपदेश करके छुड़ा देवे, और चित्त के संशयों को दूर कर देवे, उसका नाम गुरु है, मन्त्र फूंकनेवाले का नाम गुरु नहीं है। रामचन्द्रजी ने वशिष्ठजी के प्रति हजारों शंकाएँ की थीं और जब सबका उत्तर वशिष्ठजी ने देकर रामजी को संशयों से रहित करके आत्मा का बोध करा दिया, तब रामजी ने वशिष्ठजी को गुरु माना। अर्जुन ने श्रीकृष्णजी के प्रति हजारों शंकाएँ की थीं। जब अर्जुन को भगवान् ने विराट्-रूप दिखाया, तब उनको अर्जुन ने गुरु माना। इसी तरह और भी पूर्व जितने श्रेष्ठ पुरुष हुए हैं, उन्होंने चित्त के सन्देह दूर करनेवाले को ही गुरु करके माना है। सो भी व्यवहार-दृष्टि से ही माना है, आत्म-दृष्टि से नहीं माना है। क्योंकि आत्म-दृष्टि में आत्मा का भेद नहीं है।
अष्टावक्रजी ने आत्म-दृष्टि को ले करके कहा है कि संसारी मूर्ख कान में मंत्र फूंकनेवाले गुरु के ही अज्ञानार्थ शिष्य पूरे पशु बन जाते हैं, क्योंकि उनको बोध नहीं है कि पार- मार्थिक गुरु आत्म-ज्ञानी का ही नाम है। ऐसे गुरु तो संसार में बहुत दुर्लभ हैं। दूसरा गुरु गायत्री का मन्त्र