अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 136, कुल 405 में से
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नवाँ प्रकरण । —:o:—
मूलम् । कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा । एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती ॥ १ ॥
पदच्छेदः । कृताकृते, च, द्वन्द्वानि, कदा, शान्तानि, कस्य, वा, एवम्, ज्ञात्वा, इह, निर्वेदात्, भव, त्यागपरः अव्रती ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कृताकृते = | { कृत और अकृत कर्म | वा = | संशय रहित |
| च = | और | ज्ञात्वा = | जान करके |
| द्वन्द्वानि = | दुःख और सुख | इह = | इस संसार में |
| कस्य = | किसके | निर्वेदात् = | विचार से |
| कदा = | कब | अव्रती = | { व्रत रहित होता हुआ |
| शान्तानि = | शान्त हुए हैं | त्यागपरः = | त्याग परायण |
| एवम् = | इस प्रकार | भव = | हो ॥ |
भावार्थ ।
अब निर्वेदाष्टक नामक नवम प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं—
पहले शिष्य ने जो गुरु के प्रति अपना अनुभव कहा था, उसकी दृढ़ता के लिये अब आठ श्लोकों करके वैराग्य के स्वरूप को दिखलाते हैं ।
प्रश्न—त्याग कैसे करना चाहिए ?