अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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१२८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
के साथ बना रहता है, तब तक मुक्ति लेश-मात्र इसको प्राप्त नहीं होती है । इसी वार्ता को कहते हैं— जब तक जीव का शरीरादिकों से अहंकाराध्यास बना है, तब तक इसकी मुक्ति कदापि नहीं हो सकती है । जिस काल में अहंकाराध्यास इसका निवृत्त हो जाता है, उसी काल में बिना ही परिश्रम अकर्ता, अभोक्ता होकर मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायामष्टमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ८ ॥
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