अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 145, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें१३८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् । द्वयमेतद्धि जन्तूनामलंघ्यं दिनरात्रिवत् ॥ १ ॥
सुख के अनन्तर दुःख होता है, और दुःख के अनन्तर सुख होता है; ये दोनों निश्चय करके जीव को अलंघ्य हैं, याने हटाये नहीं जा सकते हैं ॥ १ ॥
सुखमध्ये स्थितं दुःखं दुःखमध्ये स्थितम् सुखम् । द्वयमन्योन्यसंयुक्तं प्रोच्यते जलपंकवत् ॥ २ ॥
सुख में दुःख, और दुःख में सुख स्थित है, अर्थात् क्षण-मात्र सुख के देनेवाले विषयों से अनेक रोगादिक दुःख उत्पन्न होते हैं, और उपवासादिक व्रतों से जिसमें दुःख होता है, फिर विषयों की प्राप्ति-रूपी सुख होता है । ये दोनों सुख दुःख ऐसे मिले हैं, जैसे पानी और कीच मिले होते हैं ॥२॥
किसी भी देहधारी से ये सुख-दुःख किसी काल में त्यागे नहीं जा सकते हैं, इस वास्ते विवेकी पुरुष उन सुख-दुःखा-दिक द्वन्द्वों में भो इच्छा को त्यागकर शरीर को प्रारब्ध आश्रित छोड़ देता है ॥ ४ ॥
मूलम् ।
नाना मतं महर्षीणां साधूनां योगिनां तथा । दृष्ट्वा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
नाना, मतम्, महर्षीणाम्, साधूनाम्, योगिनाम्, तथा, दृष्ट्वा, निर्वेदम्, आपन्नः, कः, न, शाम्यति, मानवः ॥