भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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नवाँ प्रकरण । १३७

योग्य है, ऐसा जानकर ज्ञानवान् किसी भी पदार्थ की इच्छा नहीं करता है ॥ ३ ॥

मूलम् । काऽसौ कालो वयः किं वा यत्र द्वन्द्वानि नो नृणाम् । तान्युपेक्ष्य यथा प्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ४ ॥

पदच्छेदः । कः, असौ, कालः, वयः, किम्, वा, यत्र, द्वन्द्वानि, नो, नृणाम्, तानि, उपेक्ष्य, यथा, प्राप्तवर्ती, सिद्धिम्, अवाप्नुयात् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यत्र= जिसमेंअपि तु न कोऽपि= { अर्थात् कोई नहीं
नृणाम्= मनुष्यों कोतानि= उन सबको
द्वन्द्वानि नो= सुख और दुःख न होवेउपेक्ष्य= विस्मरण करके
असौ= वहयथा प्राप्तवर्ती= { यथा प्राप्त वस्तुओं में वर्तनेवाला पुरुष
कः= कौनसिद्धिम्= { सिद्धि अर्थात् मोक्ष को
कालः= काल हैअवाप्नुयात्= प्राप्त होता है ॥
वा= और
किम्= कौन
वयः= अवस्था है

भावार्थ । पुरुषों को सुख दुःखादिक द्वन्द्व किसी खास काल या अवस्था में नहीं व्यापता है, किन्तु सब अवस्थाओं में और सर्व कालों में सुख-दुःखादिक द्वन्द्व देहधारी को बराबर बने रहते हैं। इसी वार्ता को रामजी ने अध्यात्म-रामायण में कहा है—