अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें१३६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः। अनित्यम्, सर्वम्, एव, इदम्, तापत्रितयदूषितम्, असारम्, निन्दितम्, हेयम्, इति, निश्चित्य, शाम्यति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| इदम् सर्वम्= | यह सब ही | हेयम्= | त्यागने योग्य है |
| अनित्यम्= | अनित्य है | इति= | ऐसा |
| तापत्रितय- | तीनों तापों से | निश्चित्य= | निश्चय करके |
| दूषितम् = | दूषित है | शाम्यति= | { शान्ति को प्राप्त |
| असारम्= | सार-रहित है | { होता है ॥ | |
| निन्दितम्= | निन्दित है |
भावार्थ । प्रश्न-ज्ञानी की सर्वत्र इच्छा के उपशम में क्या कारण है ? उत्तर-जितना कि दृष्टि का विषय-प्रपंच है, वह सब अनित्य है अर्थात् चेतन में अध्यस्त है । प्रश्न-यह प्रपंच कैसा है ? उत्तर-आध्यात्मिक आदि तापों करके दूषित है । वात, पित्त, श्लेष्मादि निमित्त से जो दुःख होता है, उसका नाम आध्यात्मिक दुःख है याने काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्षा, आदि करके जो मानस दुःख है, उसी का नाम आध्यात्मिक दुःख है । और जो मनुष्य, पशु, सर्प, वृक्षादि निमित्तक दुःख है, उसका नाम आधिभौतिक दुःख है । यक्ष, राक्षस, विनायकादि निमित्तक जो दुःख है, उसका नाम आधिदैविक दुःख है । इन तीन प्रकार के दुःखों करके पुरुष सदैव संतप्त रहता है । इसी वास्ते यह सब प्रपंच असार है, तुच्छ है, त्यागने-