भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 146

नवाँ प्रकरण । १३९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
नाना मतम् =नाना प्रकार के मत हैंदृष्ट्वा =देख करके
महर्षीणाम् =महर्षियों केनिर्व्वेदम् =वैराग्य को
तथा =औरआपन्नः =प्राप्त हुआ
योगिनाम् =योगियों केकः मानवः =कौन पुरुष
इति =ऐसान शाम्यति =नहीं शान्ति को प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! ‘तर्क-शास्त्र’ को, और कर्मकाण्ड में निष्ठा को, त्याग करके केवल आत्म-ज्ञान में ही निष्ठा करना चाहिए । क्योंकि तर्क-शास्त्रादिक सब बुद्धि के भ्रम करने-वाले हैं ।

गौतम आदिकों के जो मत हैं, वे वेद और युक्ति-प्रमाण से विरुद्ध हैं, केवल भ्रम-जाल में डालनेवाले हैं । गौतम आदिकों के मत पर चलनेवाले नैयायिक ईश्वर-आत्मा और जीव-आत्मा, दोनों को जड़ मानते हैं । और ज्ञान, इच्छा आदिकों को आत्मा का गुण मानते हैं । फिर ईश्वरात्मा के गुणों को नित्य मानते हैं । जीवात्मा के गुणों को अनित्य मानते हैं । और सारे जीवात्मा को व्यापक मानते हैं। आत्मा के संयोग को ज्ञान के प्रति कारण मानते हैं। परमाणुओं से जगत् की उत्पत्ति मानते हैं । फिर परमाणुओं को निरवयव मानते हैं ।

प्रथम तो जीवात्मा और ईश्वरात्मा जड़ नहीं हो सकते हैं, क्योंकि—

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म