भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 154

नवाँ प्रकरण । १४७

मूलम् । पश्य भूतविकारांस्त्वं भूतमात्रान यथार्थतः । तत्क्षणाद्वन्धनिर्मुक्तः स्वरूपस्थो भविष्यसि ॥ ७ ॥

पदच्छेदः । पश्य, भूतविकारान्, त्वम्, भूतमात्रान्, यथार्थतः, तत्क्षणात्, बन्धनिर्मुक्तः, स्वरूपस्थः, भविष्यसि ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यदा=जबतत्क्षणात्=उसी समय
भूतविकारान्= { भूतों के कार्य देह, इन्द्रिय आदि कात्वम्=तू
यथार्थतः=वास्तव मेंबन्धविनिर्मुक्तः= { बन्ध से छूटा हुआ
भूतमात्रान्=भूत मात्रस्वरूपस्थः= { अपने स्वरूप में स्थित
पश्य=देखेगाभविष्यसि=होगा ॥

भावार्थ । हे जनक ! भूतों के विकार जो देह इन्द्रियादिक हैं, उनको यथार्थ-रूप से तुम भूत-मात्र देखो, आत्म-रूप करके उनको तुम मत देखो । जब तुम ऐसे देखोगे, तब उसी क्षण में शरीरादिकों से पृथक् होकर आत्म-स्वरूप में स्थित हो जाओगे और उनका साक्षीभूत आत्मा भी तुमको करामल-कवत् प्रत्यक्ष प्रतीत होने लगेगा ॥ ७ ॥

मूलम् । वासना एव संसार इति सर्वा विमुञ्च ताः । तत्त्यागो वासनात्यागात् स्थितिरद्य यथा तथा ॥ ८ ॥