अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 155, कुल 405 में से
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१४८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः । वासनाः, एव, संसारः, इति, सर्वाः, विमुञ्च, ताः, तत्त्यागः, वासनात्यागात्, स्थितिः, अद्य, तथा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थः । | अन्वयः । | शब्दार्थः । |
|---|---|---|---|
| वासना एव | = वासनाएँ ही | तत्त्यागः | = { उसका अर्थात् संस्कार का त्याग है |
| संसारः | = संसार है | अद्यः | = ऐसा होने पर |
| इति | = ऐसा | यथा | = { जैसा कर्म है अर्थात् प्रारब्ध है |
| ज्ञात्वा | = जानकर | तथा | = उसके अनुसार |
| ताः सर्वाः | = { उन सब वासनाओं को | स्थितिः | = { शरीर की स्थिति है ॥ |
| विमुञ्च | = (तू) त्याग | ||
| वासनात्यागात् | = { वासना के त्याग से |
भावार्थ । **प्रश्न—**पूर्वोक्त युक्ति से जब पुरुष आत्मा को जान भी लेगा, तब फिर उसमें उसकी निष्ठा कैसे होवेगी ? **उत्तर—**विषयों की जो अनेक वासनाएँ हैं, वही संसार है अर्थात् बंधन है । 'योगवाशिष्ठ' में कहा है— लोकवासनया जन्तोः शास्त्रवासनयापि च । देहवासनया ज्ञानं यथावन्नैव जायते ॥ १ ॥ वासनाएं तीन प्रकार की हैं । १—लोक-वासना अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोक की प्राप्ति मुझको हो । २—दूसरी शास्त्र-वासना अर्थात् सब शास्त्रों को पढ़कर मैं ऐसा पण्डित हो जाऊँ कि मेरे तुल्य दूसरा कोई न हो ।