भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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१४८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः । वासनाः, एव, संसारः, इति, सर्वाः, विमुञ्च, ताः, तत्त्यागः, वासनात्यागात्, स्थितिः, अद्य, तथा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थः ।अन्वयः ।शब्दार्थः ।
वासना एव= वासनाएँ हीतत्त्यागः= { उसका अर्थात् संस्कार का त्याग है
संसारः= संसार हैअद्यः= ऐसा होने पर
इति= ऐसायथा= { जैसा कर्म है अर्थात् प्रारब्ध है
ज्ञात्वा= जानकरतथा= उसके अनुसार
ताः सर्वाः= { उन सब वासनाओं कोस्थितिः= { शरीर की स्थिति है ॥
विमुञ्च= (तू) त्याग
वासनात्यागात्= { वासना के त्याग से

भावार्थ । **प्रश्न—**पूर्वोक्त युक्ति से जब पुरुष आत्मा को जान भी लेगा, तब फिर उसमें उसकी निष्ठा कैसे होवेगी ? **उत्तर—**विषयों की जो अनेक वासनाएँ हैं, वही संसार है अर्थात् बंधन है । 'योगवाशिष्ठ' में कहा है— लोकवासनया जन्तोः शास्त्रवासनयापि च । देहवासनया ज्ञानं यथावन्नैव जायते ॥ १ ॥ वासनाएं तीन प्रकार की हैं । १—लोक-वासना अर्थात् स्वर्गादि उत्तम लोक की प्राप्ति मुझको हो । २—दूसरी शास्त्र-वासना अर्थात् सब शास्त्रों को पढ़कर मैं ऐसा पण्डित हो जाऊँ कि मेरे तुल्य दूसरा कोई न हो ।