अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यत्र यत्र = | जिस जिस वस्तु में | प्रौढवैराग्यम् = | असाधारण वैराग्य को |
| तृष्णा = | इच्छा | आश्रित्य = | आश्रय करके |
| भवेत् = | होवे | वीततृष्णः = | तृष्णा-रहित होता हुआ |
| तत्र = | उस उस विषे | सुखी भव = | सुखी हो ॥ |
| संसारम् = | संसार को | ||
| विद्धि = | ( तू ) जान | ||
| वै = | निश्चयपूर्वक |
भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिस-जिस प्रसिद्ध विषय में मन की तृष्णा उत्पन्न होती है, उसी उसी विषय को तुम संसार का हेतु जानो । क्योंकि विषयों की तृष्णा ही कर्म द्वारा संसार का हेतु है । यही वार्ता ‘योगवाशिष्ठ’ में भी लिखी है—
मनोरथरथारूढं युक्तमिन्द्रियवाजिभिः ।
भ्राम्यत्येव जगत्कृत्स्नं तृष्णासारथिचोदितम् ॥ १ ॥
मनोरथ-रूपी रथ है, इन्द्रिय-रूपी घोड़े उसके आगे बँधे हैं, उसी रथ पर सारा जगत् आरूढ़ हो रहा है और तृष्णा-रूपी सारथि उसको भ्रमा रहा है ॥ १ ॥
यथा हि शृंगगोकाले वर्धमानेन वर्धते ।
एवं तृष्णापि चित्तेन वर्धमानेन वर्धते ॥ २ ॥
जैसे गौ के दोनों शृंग गौ के शरीर के साथ ही बराबर बढ़ते हैं, वैसे ही तृष्णा भी चित्त के साथ ही बराबर बढ़ती है ॥ २ ॥