अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसवां प्रकरण । १५५
प्राप्त पदार्थ के अधिक प्राप्त होने की इच्छा से और अप्राप्त पदार्थ के प्राप्त की इच्छा से रहित होकर आत्मा में निष्ठा करने से जीव सुखी होता है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते ।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तिपुष्टिर्मुहुर्मुहुः ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
तृष्णामात्रात्मकः, बन्धः, तन्नाशः, मोक्षः, उच्यते, भवासंसक्तिमात्रेण, प्राप्तितुष्टिः, मुहुः, मुहुः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| तृष्णामात्रात्मकः = | { तृष्णा-मात्र-स्वरूप | भवासंसक्तिमात्रेण = | { संसार में असङ्ग होने से |
| बन्धः = | बन्ध है | मुहुःमुहुः = | वारंवार |
| तन्नाशः = | उसका नाश | प्राप्तितुष्टिः = | { आत्मा की प्राप्ति और तृप्ति होती है ॥ |
| मोक्षः = | मोक्ष | ||
| उच्यते = | कहा जाता है |
भावार्थ ।
तृष्णा-मात्र का नाम ही बन्ध है और उसके नाश का नाम मोक्ष है, 'योगवाशिष्ठ' में कहा है—
च्युता दन्ताः सिताः केशा दृङ् निरधोः पदे पदे ।
यातसज्जमिमं देहं तृष्णा साध्वी न मुञ्चति ॥ १ ॥
अर्थात् पुरुष के दांत टूट भी जाते हैं, केश श्वेत हो जाते हैं, नेत्र की दृष्टि कम भी हो जाती है और कदम-कदम पर पांव