भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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दसवां प्रकरण । १५५

प्राप्त पदार्थ के अधिक प्राप्त होने की इच्छा से और अप्राप्त पदार्थ के प्राप्त की इच्छा से रहित होकर आत्मा में निष्ठा करने से जीव सुखी होता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

तृष्णामात्रात्मको बन्धस्तन्नाशो मोक्ष उच्यते ।
भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तिपुष्टिर्मुहुर्मुहुः ॥ ४ ॥

पदच्छेदः ।

तृष्णामात्रात्मकः, बन्धः, तन्नाशः, मोक्षः, उच्यते, भवासंसक्तिमात्रेण, प्राप्तितुष्टिः, मुहुः, मुहुः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तृष्णामात्रात्मकः ={ तृष्णा-मात्र-स्वरूपभवासंसक्तिमात्रेण ={ संसार में असङ्ग होने से
बन्धः =बन्ध हैमुहुःमुहुः =वारंवार
तन्नाशः =उसका नाशप्राप्तितुष्टिः ={ आत्मा की प्राप्ति और तृप्ति होती है ॥
मोक्षः =मोक्ष
उच्यते =कहा जाता है

भावार्थ ।

तृष्णा-मात्र का नाम ही बन्ध है और उसके नाश का नाम मोक्ष है, 'योगवाशिष्ठ' में कहा है—

च्युता दन्ताः सिताः केशा दृङ् निरधोः पदे पदे ।
यातसज्जमिमं देहं तृष्णा साध्वी न मुञ्चति ॥ १ ॥

अर्थात् पुरुष के दांत टूट भी जाते हैं, केश श्वेत हो जाते हैं, नेत्र की दृष्टि कम भी हो जाती है और कदम-कदम पर पांव