अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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१५६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
फिसलते भी हैं, पर तब भी यह तृष्णा उस पुरुष से नहीं त्यागी जाती है ॥ १ ॥
तृष्णे देविनमस्तुभ्यं धैर्यविप्लवकारिणी । विष्णुस्त्रैलोक्यपूज्योऽपि यत्त्वया वामनीकृतम् ॥ २ ॥
हे तृष्णे ! हे देवि ! तेरे प्रति मेरा नमस्कार है, क्योंकि तू पुरुष की धैर्यता नाश करनेवाली है । जो विष्णु तीनों लोकों में पूज्य था, उसको भी तूने वामन याने छोटा बना दिया ॥ २ ॥
हे जनक ! तृष्णा का त्याग ही मुक्ति का हेतु है ॥४॥
मूलम् । त्वमेकश्चेतनः शुद्धो जडं विश्वमसत्तथा । अविद्यापि न किञ्चित्सा का बुभुत्सा तथापि ते ॥ ५ ॥
पदच्छेदः । त्वम्, एकः, चेतनः, शुद्धः, जडम्, विश्वम्, असत्, तथा, अविद्या, अपि, न, किञ्चित्, सा, का, बुभुत्सा, यथा, अपि, ते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| त्वम् = | तू | तथा = | वैसे ही |
| एकः = | एक | सा अविद्या अपि=$ | वह अविद्या भी |
| शुद्धः = | शुद्ध | ||
| चेतनः = | चैतन्य-रूप है | न किञ्चित् = | असत् है |
| विश्वम् = | संसार | तथा अपि = | ऐसा होने पर भी |
| जडम् = | जड़ | ते = | तुझको |
| च = | और | का = | क्या |
| असत् = | असत् है | बुभुत्सा = | जानने की इच्छा है ॥ |