भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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दशवाँ प्रकरण । १५७

भावार्थ ।

प्रश्न–यदि तृष्णा-मात्र बन्धन का हेतु माना जावे, तो आत्मज्ञान की प्राप्ति का हेतु भी तृष्णा-बन्धन का हेतु होना चाहिए ?

उत्तर–अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! इस जगत् में तीन ही पदार्थ हैं—एक आत्मा, दूसरा जगत्, तीसरी अविद्या ।

प्रथम आत्मा के लक्षण को दिखाते हैं—

स्थूल सूक्ष्मकारणशरीराद्व्यतिरिक्तोऽवस्थात्रयसाक्षी सच्चिदानन्दस्वरूपो यस्तिष्ठति स आत्मा ॥ १ ॥

अर्थ—जो स्थल, सूक्ष्म और कारण इन तीनों शरीरों से भिन्न है और जो जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं का साक्षी सच्चिदानन्द है, वही आत्मा है ॥ १ ॥

उसकी प्राप्ति के लिये तृष्णा करना उचित है ।

अनादिभावत्वे सति ज्ञाननिवर्तत्वमज्ञानत्वम् ॥ २ ॥

जो अनादिभाव-रूप है, और आत्म-ज्ञान करके निवृत्त है, वही अज्ञान अर्थात् अविद्या है ॥ २ ॥

गच्छतीति जगत् ॥ ३ ॥

जो सदैव गमन करता रहे अर्थात् नदी के प्रवाह की तरह चलता रहे, वही जगत् है ॥ ३ ॥

हे जनक ! तुम इन तीनों में से एक ही चेतन शुद्ध आत्मा हो, अपने आत्मा को ही पूर्ण-रूप करके निश्चय करो और जगत् को असत्-रूप करके जानो । अविद्या सदसत् से