भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 165

१५८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

विलक्षण और अनिर्वचनीय है। उसका कार्य जगत् भी अनिर्वचनीय है। इस वास्ते इन दोनों में तृष्णा करनी अनु- चित है, क्योंकि दोनों मिथ्या हैं। मिथ्या वस्तु में मूर्ख अज्ञानी तृष्णा को करता है, ज्ञानवान् कदापि नहीं करता है॥५॥

मूलम्। राज्यं सुताः कलत्राणि शरीराणि सुखानि च। संसक्तस्यापि नष्टानि तव जन्मनि जन्मनि॥६॥

पदच्छेदः। राज्यम्, सुताः, कलत्राणि, शरीराणि, सुखानि, च, संसक्तस्य, अपि, नष्टानि, तव, जन्मनि, जन्मनि।

अन्वयः। शब्दार्थ।अन्वयः। शब्दार्थ।
राज्यम्=राज्यनष्टानि=नष्ट हुए हैं
सुताः=लड़के+च=और
कलत्राणि=स्त्रियाँतव=तेरे
शरीराणि=शरीरअपि=भी
=औरएते=ये सब
सुखानि=सुखजन्मनि जन्मनि=हर एक जन्म में
संसक्तस्य=आसक्त पुरुष केनष्टानि=नष्ट हुए हैं॥

भावार्थ। अष्टावक्रजी जगत् को असत्य-रूप दिखलाते हैं— हे जनक ! राजभोग और स्त्री, पुत्रादिक ये सब तो तुमको अनेक जन्मों में मिलते ही रहे हैं और नष्ट भी होते रहे हैं। क्योंकि पहले जन्मों में जो तुमको स्त्री-पुत्रादिक