अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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ग्यारहवाँ प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् । भावाभावविकारश्च स्वभावदिति निश्चयी । निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति ॥ १ ॥
पदच्छेदः । भावाभावविकारः, च, स्वभावात्, इति, निश्चयी, निर्विकारः, गतक्लेशः, सुखेन, एव, उपशाम्यति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| भावाभाव- विकारः=$ | भाव और अभाव का विकार | निर्विकारः= | विकार-रहित |
| गतक्लेशः= | क्लेश-रहित पुरुष | ||
| स्वभावात्= | स्वभाव से होता है | सुखेन एव= | सुख से ही |
| इति= | ऐसा | $उपशाम्यति=$ | शान्ति को प्राप्त होता है ॥ |
| निश्चयी= | निश्चय करनेवाला |
भावार्थ । अब ज्ञानाष्टक नामक एकादश प्रकरण का आरम्भ करते हैं । चित्त की शान्ति आत्म-ज्ञान से ही होती है, विना आत्म-ज्ञान के किसी उपाय करके नहीं होती है । इस वास्ते प्रथम आत्म-ज्ञान के साधनों को कहते हैं । भावाभाव अर्थात् स्थूल-सूक्ष्मरूप करके जितने विकार अर्थात् कार्य हैं, वे सब माया और माया के संस्कारों से ही