भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 405 में से

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पृष्ठ 171

ग्यारहवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् । भावाभावविकारश्च स्वभावदिति निश्चयी । निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति ॥ १ ॥

पदच्छेदः । भावाभावविकारः, च, स्वभावात्, इति, निश्चयी, निर्विकारः, गतक्लेशः, सुखेन, एव, उपशाम्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
भावाभाव- विकारः=$भाव और अभाव का विकारनिर्विकारः=विकार-रहित
गतक्लेशः=क्लेश-रहित पुरुष
स्वभावात्=स्वभाव से होता हैसुखेन एव=सुख से ही
इति=ऐसा$उपशाम्यति=$शान्ति को प्राप्त होता है ॥
निश्चयी=निश्चय करनेवाला

भावार्थ । अब ज्ञानाष्टक नामक एकादश प्रकरण का आरम्भ करते हैं । चित्त की शान्ति आत्म-ज्ञान से ही होती है, विना आत्म-ज्ञान के किसी उपाय करके नहीं होती है । इस वास्ते प्रथम आत्म-ज्ञान के साधनों को कहते हैं । भावाभाव अर्थात् स्थूल-सूक्ष्मरूप करके जितने विकार अर्थात् कार्य हैं, वे सब माया और माया के संस्कारों से ही