भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 405 में से

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पृष्ठ 170

दशवाँ प्रकरण । १६३

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
कति=कितनेकर्म्म=कर्म्म
जन्मानि=जन्मों तकन कृतम्=<br>$\Big{$<br>क्या नहीं किया गया
कायेन=शरीर करके+ इति=ऐसा
मनसा=मन करकेतत्=वह कर्म्म
गिरा=वाणी करकेअद्यापि=अब तो
दुःखम्=दुःख देनेवालाआयासदम्=<br>$\Big{$<br>उपराम किया जावे ॥
आयासदम्=<br>$\Big{$<br>परिश्रम करनेवाला

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी तृष्णा के उपशम को पूर्व कह करके अब क्रिया के उपशम को कहते हैं—

हे जनक ! शरीर, मन और इन्द्रियों को परिश्रम देनेवाले कर्मों को तुम अनेक जन्मों तक करते आए हो, और उन कर्मों के फल जन्म-मरण-रूपी चक्र में भ्रमण करते चले आए हो। अब दिन प्रति दिन अनेक दुःख उठाते आए, पर कुछ सुख न मिला, अतएव तुम कर्मों से उपरामता को प्राप्त हो। क्योंकि पुरुष उपरामता होने के, बिना जीवन्मुक्ति के सुख को नहीं प्राप्त होता ॥ ८ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां दशमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १० ॥

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