अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
दशवाँ प्रकरण । १६३
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| कति=कितने | कर्म्म=कर्म्म |
| जन्मानि=जन्मों तक | न कृतम्=<br>$\Big{$<br>क्या नहीं किया गया |
| कायेन=शरीर करके | + इति=ऐसा |
| मनसा=मन करके | तत्=वह कर्म्म |
| गिरा=वाणी करके | अद्यापि=अब तो |
| दुःखम्=दुःख देनेवाला | आयासदम्=<br>$\Big{$<br>उपराम किया जावे ॥ |
| आयासदम्=<br>$\Big{$<br>परिश्रम करनेवाला |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी तृष्णा के उपशम को पूर्व कह करके अब क्रिया के उपशम को कहते हैं—
हे जनक ! शरीर, मन और इन्द्रियों को परिश्रम देनेवाले कर्मों को तुम अनेक जन्मों तक करते आए हो, और उन कर्मों के फल जन्म-मरण-रूपी चक्र में भ्रमण करते चले आए हो। अब दिन प्रति दिन अनेक दुःख उठाते आए, पर कुछ सुख न मिला, अतएव तुम कर्मों से उपरामता को प्राप्त हो। क्योंकि पुरुष उपरामता होने के, बिना जीवन्मुक्ति के सुख को नहीं प्राप्त होता ॥ ८ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां दशमं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १० ॥
—:०:—
ग्यारहवाँ प्रकरण (भाव-शान्ति)
ग्यारहवाँ प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् । भावाभावविकारश्च स्वभावदिति निश्चयी । निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति ॥ १ ॥
पदच्छेदः । भावाभावविकारः, च, स्वभावात्, इति, निश्चयी, निर्विकारः, गतक्लेशः, सुखेन, एव, उपशाम्यति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| भावाभाव- विकारः=$ | भाव और अभाव का विकार | निर्विकारः= | विकार-रहित |
| गतक्लेशः= | क्लेश-रहित पुरुष | ||
| स्वभावात्= | स्वभाव से होता है | सुखेन एव= | सुख से ही |
| इति= | ऐसा | $उपशाम्यति=$ | शान्ति को प्राप्त होता है ॥ |
| निश्चयी= | निश्चय करनेवाला |
भावार्थ । अब ज्ञानाष्टक नामक एकादश प्रकरण का आरम्भ करते हैं । चित्त की शान्ति आत्म-ज्ञान से ही होती है, विना आत्म-ज्ञान के किसी उपाय करके नहीं होती है । इस वास्ते प्रथम आत्म-ज्ञान के साधनों को कहते हैं । भावाभाव अर्थात् स्थूल-सूक्ष्मरूप करके जितने विकार अर्थात् कार्य हैं, वे सब माया और माया के संस्कारों से ही
ग्यारहवाँ प्रकरण । १६५
उत्पन्न होते हैं और निर्विकार आत्मा से कोई भी विकार नहीं होता है ।
**प्रश्न—**माया जड़ है, आत्मा चेतन है। केवल जड़ माया से कार्य उत्पन्न नहीं हो सकता है, और न केवल चेतन से उत्पन्न हो सकता है। क्योंकि निरवयव आत्मा से सावयव कार्य नहीं उत्पन्न हो सकता है, और न केवल जड़ माया में आप से आप विना चेतन के सम्बन्ध, कोई कार्य उत्पन्न हो सकता है। यदि होवे, तब विना ही कुलाल के आपसे आप मृत्तिका से घट उत्पन्न हो जाना चाहिए पर ऐसा तो नहीं होता है। तब आपने कैसे कहा कि स्थूल-सूक्ष्मरूप कार्य सब माया से ही उत्पन्न होते हैं, चेतन से नहीं होते हैं ?
**उत्तर—**हे जनक ! जैसे चुम्बक पत्थर की शक्ति करके लोहे में चेष्टा होती है, चुम्बक पत्थर में नहीं होती, वैसे चेतन की सत्ता करके माया से कार्य उत्पन्न होते हैं, चेतन से नहीं होते हैं। जैसे शरीर में जीवात्मा की सत्ता से नख-रोमादिक उत्पन्न होते हैं। आत्मा में नहीं होते हैं। आत्मा असंग है, निर्विकार है; शरीर विकारी और नाशी है। आत्मा नित्य है, चेतन है; शरीर जड़ है, अनित्य है; ऐसा निश्चय करनेवाला पुरुष विना परिश्रम के शान्ति को प्राप्त होता है, दूसरा नहीं होता है ॥ १ ॥
मूलम् ।
ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी ।
अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते ॥ २ ॥
१६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
ईश्वरः, सर्वन्निर्माता, न, इह, अन्यः, इति, निश्चयी, अन्तर्गलित सर्वाशः, शान्तः, क्व, अपि, न, सज्जते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सर्वन्निर्माता = | सबका पैदा करनेवाला | $\left.\begin{aligned} अन्तर्गलित \ सर्वाश \end{aligned}\right}=$ | अन्तःकरण में गलित हो गई हैं सब आशाएँ जिसकी |
| इह = | इस संसार में | च = | और |
| ईश्वरः = | ईश्वर है | यस्य आत्मा = | जिसका मन |
| अन्य = | दूसरा कोई | शान्तः = | शान्त हुआ है |
| न = | नहीं है | क्व अपि = | कहीं भी |
| इति = | ऐसा | न = | नहीं |
| निश्चयी = | निश्चय करनेवाला पुरुष | सज्जते = | आसक्त होता है ॥ |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**आपने कहा है कि आत्मा की सत्ता करके भावाभाव-विकार उत्पन्न होते हैं, सो आत्मा दो हैं । एक जीवात्मा है, दूसरा ईश्वरात्मा है । दोनों में से किसकी सत्ता करके भावाभाव विकार उत्पन्न होते हैं ।
**उत्तर—**ईश्वरात्मा की सत्ता करके जगत् भर के पदार्थ उत्पन्न होते हैं । जीवात्मा की सत्ता करके शरीर के नख रोमादिक उत्पन्न होते हैं । क्योंकि वह आत्मा अपने शरीर-मात्र में ही है और इसी कारण परिच्छिन्न है । उसकी सत्ता करके जगत् के पदार्थ उत्पन्न नहीं हो सकते हैं, और ईश्वर सर्वत्र व्यापक है, और सारे जगत् से बड़ा है । उसकी उपाधि माया भी बड़ी है, इसी वास्ते सर्वत्र ईश्वर की सत्ता
ग्यारहवाँ प्रकरण । १६७
करके पदार्थ उत्पन्न होते हैं, और जीव की उपाधि जो अंतःकरण है वह अल्प शरीर में स्थित है, इस वास्ते उसकी सत्ता करके शरीर के अवयव आदिक बढ़ते हैं। अल्प उपाधि-वाला होने से जीव अल्पज्ञ अल्प शक्तिवाला है, और बड़ी उपाधिवाला होने से ईश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् है, इसी कारण ईश्वर को ही लोक जगत् का कर्त्ता मानते हैं। वास्तव में वह कर्त्ता नहीं है, केवल माया उपाधि करके कर्तृत्व व्यवहार भी ईश्वर में गौण है, मुख्य नहीं है। वह वास्तव में अकर्त्ता है और जीव भी वास्तव में अकर्त्ता है।
प्रश्न—आपने पूर्व कहा था कि चेतन एक है, अब आप जीव और ईश्वर-भेद करके दो चेतन कहते हैं ?
उत्तर—वास्तव में चेतन एक ही है, परन्तु कल्पित उपाधियों के भेद से चेतन का भेद हो जाता है, हे राजन् ! अविद्यातत्कार्य-रहितः शुद्धः। अविद्या और अविद्या के कार्य से रहित जो चेतना है, उसी का नाम शुद्ध चेतन है, उसी को निर्गुणब्रह्म भी कहते हैं।
सर्वनामरूपात्मकप्रपंचाध्यासाधिष्ठानत्वं ब्रह्मत्वम् ।
संपूर्ण नामरूपात्मक प्रपंच के अध्यास का जो अधिष्ठान होवे, उसी का नाम ब्रह्म है, उसी शुद्ध चेतन में सारा नाम-रूपात्मक जगत् अध्यस्त है।
माया में प्रतिबिंबित चेतन का नाम ईश्वर है, अंतःकरण में प्रतिबिंबित चेतन का नाम जीव है। माया एक है, इस वास्ते उसमें प्रतिबिंबित चेतन ईश्वर भी एक ही कहा जाता है।
१६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अविद्या के अंश अन्तःकरण नाना हैं, उनमें प्रतिबिंबित चेतन भी नाना हैं। चेतन के तीन भेद हैं। १—विषयचेतन, २—प्रमाणचेतन, ३—प्रमातृचेतन॥
घटावच्छिन्नचैतन्यं विषयचैतन्यम्॥ घटावच्छिन्न चेतन का नाम विषयचेतन है॥ १॥
अन्तःकरणवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यं प्रमाणचैतन्यम्॥ अंतःकरण की वृत्त्यवच्छिन्न चेतन का नाम प्रमाणचेतन है॥ २॥
अन्तःकरणावच्छिन्नं चैतन्यं प्रमातृचैतन्यम्॥ अन्तःकरणावच्छिन्न चेतन का नाम प्रमातृचेतन है॥ ३॥
घटादिक विषय अनन्त हैं, इसलिये उनसे सम्बन्ध रखनेवाली अन्तःकरण की वृत्तियाँ भी अनन्त हैं और अन्तःकरण भी अनन्त हैं, इन उपाधियों के भेद करके चेतन के भी अनन्त भेद हो गये हैं। वास्तव में चेतन एक महाकाश की तरह है। जैसे महाकाश का घटमठादि उपाधियों के साथ वास्तव में कोई भी सम्बन्ध नहीं है, वैसे कल्पित उपाधियों के साथ अन्तःकरणों का कोई भी सम्बन्ध नहीं है, ऐसे निश्चय करनेवाला पुरुष निश्चल चित्त होकर कहीं भी संसक्त नहीं होता है॥ २॥
मूलम्। आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी। तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वाञ्छति न शोचति॥ ३॥
ग्यारहवाँ प्रकरण । १६९
पदच्छेदः ।
आपदः, सम्पदः, काले, दैवात्, एव, इति, निश्चयी, तृप्तः, स्वस्थेन्द्रियः, नित्यम्, न, वाञ्छति, न, शोचति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| काले= | समय पर | नित्यमतृप्तः= | नित्य संतुष्ट व स्वस्थेन्द्रिय हुआ |
| आपदः= | आपत्तियाँ | स्वस्थेन्द्रियः | |
| च= | और | अप्राप्त वस्तु की इच्छा नहीं करता है | |
| सम्पदः= | सम्पत्तियाँ | न वाञ्छति= | |
| दैवात् एव= | दैवयोग से ही होती है | च= | और |
| न= | न | ||
| इति निश्चय= | ऐसा निश्चय करनेवाला पुरुष | शोचति= | नष्ट हुई वस्तु को शोचता है ॥ |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**यदि ईश्वर ही सर्व जगत् का रचनेवाला माना जावेगा, तब फिर किसी को दरिद्री, किसी को धनी, किसी को दुःखी किसी को सुखी न होना चाहिए । पर ऐसा प्रत्यक्ष देखते हैं, इसलिये ईश्वर में विषम दृष्टि आदिक दोष आते हैं ?
**उत्तर—**हे राजन् ! ईश्वर में दोष तब आवे, जब ईश्वर किन्हीं कर्मों को रचे, सो तो नहीं है; क्योंकि गीता में भी लिखा है—
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥ १ ॥
१७० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
ईश्वर जीवों के कर्तृत्वपने को और कर्मों को नहीं रचता है और कर्मों के फल के संयोग को भी नहीं रचता, ये सब अनादिकाल के संस्कारों से होते हैं अर्थात् अनादि- काल से चले आते हैं, इस वास्ते ईश्वर में कोई दोष नहीं आता है ॥ १ ॥
प्रश्न-कर्म जड़ है, स्वतः फल को नहीं दे सकता है और जीव असमर्थ है वह भी अपने आप फल को नहीं भोग सकता है, तब फिर फलदाता ईश्वर में दोष क्यों नहीं आवेगा ?
उत्तर-ईश्वर में दोष तब आवे, जब ईश्वर जीवों से शुभ अशुभ कर्म करावे और फिर उनको फल देवे या जीवों को उत्पन्न करके उनसे कर्म करावे, ऐसा तो नहीं है, क्योंकि प्रवाह-रूप करके सारा जगत् अनादि चला आता है, कोई भी नई वस्तु जीव या ईश्वर उत्पन्न नहीं करता है । जैसे पृथिवी में सब वनस्पति के बीज रहते हैं, परन्तु विना सहकारी कारण सामग्री के अंकुरों को उत्पन्न नहीं कर सकते हैं, वैसे माया में सब प्रकार के पदार्थों के सूक्ष्मरूप से बीज बने रहते हैं, परन्तु विना सहकारी कारण के उत्पन्न नहीं होते हैं । जिस काल में उसकी उत्पत्ति की सामग्री जुड़ जाती है, उसी काल में वह उत्पन्न हो जाते हैं । जैसे जुदा खेतों में जुदा जुदा बीज हल जोतकर किसान बो देता है यानी किसी में चना, किसी में गेहूँ, किसी में मटर आदि बोता है, परन्तु विना तरी के वे नहीं उत्पन्न होते हैं और पानी बिना बीज के फल को नहीं दे सकते हैं । जब खेत बोया हो और समय
ग्यारहवाँ प्रकरण । १७१
पर वर्षा हो, तब जाकर बीजों से आगे फल उत्पन्न होते हैं । वर्षा सब खेतों में एकसाँ बराबर होती है, पर जैसा-जैसा बीज जिस खेत में होता है वैसा-वैसा उसमें फल उत्पन्न होता है, न केवल खेत फल को उत्पन्न कर सकता है, न केवल बीज ही फल को उत्पन्न कर सकता है । खेत, बीज और वर्षा तीनों मिल करके ही फल को उत्पन्न करते हैं, वैसे ही दाष्ट्रान्त में बादल स्थानापन्न ईश्वर हैं, खेत स्थानापन्न जीवों के अन्तःकरण हैं, बीज स्थानापन्न जीवों के संचितकर्म हैं, ईश्वर की सत्ता-रूपी वर्षा सर्वत्र तुल्य है, क्योंकि ईश्वर चेतन सर्वत्र तुल्य है, परन्तु जैसे-जैसे जिसके कर्म-रूपी बीज अन्तःकरण-रूपी खेत में स्थित हैं, वैसे-वैसे उसको फल होते हैं । ईश्वर स्वतंत्र अर्थात् कर्मों के विना फल का प्रदाता नहीं है । यदि ऐसा हो, तो उसमें विषम दोष आवे, इसी वास्ते ईश्वर न्यायकारी है ।
प्रश्न—यदि ईश्वर न्यायकारी माना जावे, तब दयालुता आदिक गुण उसमें नहीं रहेंगे ।
उत्तर—दयालुता आदिक गुण यदि माने जावेंगे, तब न्यायकारिता नहीं रहती है, क्योंकि दोनों परस्पर विरोधी हैं ।
जो राजा न्यायकारी होता है, वह दयालु नहीं होता है । यदि दयालुता करेगा, तब किसी हननकर्त्ता पुरुष को हनन करने की आज्ञा नहीं देगा और यदि देगा, तब वह रोने-चिल्लाने लगेगा, क्योकि प्राण तो सबके प्यारे हैं । उसके दुःख को देखकर राजा को उस पर दया होगी और दया के वश होकर राजा उसको छोड़ देगा, तब उसकी
१७२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
न्यायकारिता जाती रहेगी । इसी तरह ईश्वर भी यदि पापियों को पाप का फल जो दुःख है, उसको नहीं देगा और दया करके छोड़ देगा, तब जगत् में कोई भी दुःखी नहीं रहेगा, पर ऐसा तो नहीं देखते हैं, क्योंकि संसार में लाखों पुरुष बड़े-बड़े असाध्य रोगों करके दुःखी हैं, रात-दिन ईश्वर ! ईश्वर ! पुकारते पुकारते मर जाते हैं, और उनका दुःख दूर नहीं होता है। लाखों अकाल में अन्न बिना मर जाते हैं और जीव कर्म के फल दुःखों को भोगकर अच्छे हो जाते हैं । अनेक प्रकार के कार्य हैं, अनेक प्रकार के उनके फल हैं, बिना भोग के कर्म नहीं छूटते हैं। इन्हीं युक्तियों से सिद्ध होता है कि ईश्वर न्यायकारी है, दयालु नहीं है।
प्रश्न- फिर भक्त लोग ईश्वर की भक्ति करने के काल में क्यों कहते हैं कि हे ईश्वर ! आप दयालु हैं, कृपालु हैं और न्यायकारी है ?
उत्तर- गुणारोप्य के बिना भक्ति और उपासना नहीं हो सकती है। जैसे मिथ्या कल्पी हुई मूर्तिके ध्यान करने से अर्थात् उस मूर्ति में चित्त के रोकने से चित्त में शान्ति और आनन्द होता है अर्थात् चित्त के निरोध से नित्य आत्मसुख की प्राप्ति होती है, वैसे ही मिथ्या दयालुतादिक गुणों को ईश्वर में आरोप्य करने से भी ईश्वर में प्रेम उत्पन्न होता है और उस प्रेम से पुरुष को आनन्द होता है, उसी प्रेम का नाम भक्ति है। दयालुतादिक गुणों का आरोप्य करना निरर्थक नहीं है वास्तव में तो ईश्वर गुणातीत है। गुण माया का कार्य है, और माया के सम्बन्ध करके ईश्वर गुणों-
ग्यारहवाँ प्रकरण । १७३
वाला कहा जाता है । संसार में सब जीवों को आपदाएँ और सम्पदाएँ प्रारब्धकर्मों के अनुसार ही प्राप्त होती हैं, ऐसे निश्चय करनेवाला जो पुरुष है, और भोगों की तृष्णा से जो रहित है, और जिसके इन्द्रियादिक वश में हैं, और किसी पदार्थ में जिसकी इच्छा नहीं है, अर्थात् जो अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति की इच्छा नहीं करता है, और जो प्राप्त वस्तु के नष्ट होने से शोक नहीं करता, वही नित्य सुख को प्राप्त होता है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी । साध्यादर्शी निरायासःकुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
सुखदुःखे, जन्ममृत्यू, दैवात्, इति, निश्चयी, साध्यादर्शी, निरायासः, कुर्वन्, अपि, न, लिप्यते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सुखदुःखे= | सुख और दुख | च= | और |
| जन्ममृत्यू= | जन्म और मरण | निरायासः= | श्रम-रहित |
| दैवात् एव= | दैव से ही होता है | कुर्वन्= | कर्म को करता हुआ |
| इति= | ऐसा | न लिप्यते= | नहीं लिप्त होता है ॥ |
| निश्चयी= | निश्चय करनेवाला | ||
| साध्यादर्शी= | साध्य कर्म को देखनेवाला |
१७४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
**प्रश्न—**पूर्वोक्त निश्चय करनेवाले ज्ञानी भी तो कर्मों को करते हुए दिखाई पड़ते हैं ? उनको कर्मों का फल होगा, या नहीं ?
**उत्तर—**जो यथार्थ बोधवाले हैं, उनको कर्मों का फल नहीं होगा, क्योंकि प्रथम वे फल की कामना से रहित होकर कर्मों को करते हैं, दूसरे वे श्रेष्ठाचार के लिये कर्मों को करते हैं, तीसरे वे कर्मों को देह इन्द्रियादिकों के धर्म जानते हैं, अपने आत्मा का धर्म नहीं मानते हैं, चौथे अहंकार से रहित होकर वे कर्मों को करते हैं, इन्हीं चार हेतुओं करके उनको कर्मों का फल नहीं होता है ।
गीता में भी कहा है—
यस्य नाहं कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमांल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १ ॥
जिसका देह इन्द्रियादिकों में अहंकृतभाव नहीं है, अर्थात् मैं देह हूँ, या मेरा यह देह है, इस प्रकार की जिसका भावना नहीं है और कर्तृत्व-भोक्तृत्व बुद्धि भी जिसकी लिपायमान नहीं हो सकती है, सो विद्वान् यदि प्रारब्धकर्म के वश से शरीरादिकों करके तीनों लोकों का बध भी कर देवे, तो भी उसको ऐसा करने का फल लिपायमान नहीं होता है । जो इस प्रकार निश्चय करता है कि सुख-दुःखादिक ये सब प्रारब्धकर्म के वश से जीवों को होते हैं, वह विद्वान् परिश्रम से रहित प्रारब्धवश से कर्मों को करता हुआ उनके फल के साथ लिपायमान नहीं होता है ॥ ४ ॥
ग्यारहवां प्रकरण । १७५
मूलम् ।
चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी ।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
चिन्तया, जायते, दुःखम्, न, अन्यथा, इह, इति, निश्चयी, तथा, हीनः, सुखी, शान्तः, सर्वत्र, गलितस्पृहः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| इह = | इस संसार में | सुखी = | सुखी और |
| चिन्तया = | चिन्ता से | शान्तः = | शान्त है |
| दुःखम् = | दुःख | सर्वत्रगलितस्पृहः = | सर्वत्र उसकी इच्छा गलित है |
| जायते = | उत्पन्न होता है | +च = | और |
| अन्यथा = | और प्रकार से | तथा = | उससे अर्थात् चिन्ता से |
| न = | नहीं | हीनः = | रहित है ॥ |
| इति = | ऐसा | ||
| निश्चयी = | निश्चय करनेवाला |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**कर्मों को करता हुआ पुरुष उनके फल के साथ लिपायमान क्यों नहीं होता है ? जो कर्ता होता है वही भोक्ता भी अवश्य होता है ?
**उत्तर—**इस संसार में पुरुष को चिन्ता करने से ही दुख उत्पन्न होता है, विना चिन्ता के दुःख नहीं होता है, जो इस प्रकार निश्चय करता है, वह चिन्ता को त्याग देता है,
१७६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
और शान्तचित्त और स्थिर अन्तःकरणवाला होता है, और श्रम से रहित होकर भी कर्मों से जन्य अर्थों का भोगनेवाला नहीं होता है ॥ ५ ॥
मूलम् ।
नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी ।
कैवल्यमिव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
न, अहम्, देहः, न, मे, देहः, बोधः, अहम्, इति, निश्चयी, कैवल्यम्, इव, संप्राप्तः, न, स्मरति, अकृतम्, कृतम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहम् = | मैं | कैवल्यम् = | विदेह मुक्ति को |
| देहः = | शरीर | संप्राप्तः = | प्राप्त होता हुआ |
| न = | नहीं हूँ | निश्चयी = | निश्चय करनेवाला पुरुष |
| देहः = | देह | ||
| मे = | मेरा | अकृतं कृतम् = | अकृत और कृत कर्म को |
| न = | नहीं है | ||
| बोधोऽहम् = | ज्ञानस्वरूप हूँ | न स्मरति = | नहीं स्मरण करता है ॥ |
| इति = | इस प्रकार |
भावार्थ ।
पूर्वोक्त साधनों करके युक्त जो ज्ञानी हैं, उनकी दशा को दिखाते हैं—
ग्यारहवाँ प्रकरण । १७७
ज्ञानवान् का ऐसा निश्चय होता है “नाहं देहः” मैं देह नहीं हूँ और “न मे देहः” मेरा यह देह नहीं है और मैं नित्य बोध-स्वरूप हूँ । आत्म-ज्ञान करके देहादिकों में दूर हो गया है अहं और मम अभिमान जिसका, कर्तव्य और अकर्तव्य जिसका बाकी नहीं रहा है, और कृत तथा अकृत का स्मरण भी जिसको नहीं है वही ज्ञानवान् जीवन्मुक्त कहा जाता है । इसमें एक दृष्टान्त को कहते हैं—
एक मंदिर में एक महात्मा रहते थे । आत्म-विद्या का अभ्यास करते करते उनकी अवस्था चढ़ गई थी, और शरीर की सब क्रियाएँ उनकी छूट गई थीं । अतः जब कोई उनके मुख में भोजन डाल देता, तब खाते, जब कोई पानी पिलाता, तब पानी पीते थे और एक स्थान में बैठे रहते थे, किसी से बोलते, चालते न थे और अपने आत्मानंद में ही मग्न रहते थे । एक दिन दोपहर के समय उसी मंदिर में लड़के खेलते थे । एक लड़के ने कहा कि इन महात्मा के पट पर याने स्थल पर चौपट बनाकर खेलें, दूसरा लड़का चाकू ले आया और जब चाकू से पट पर लकीरें खींचने लगा, तब उसमें से रुधिर बहने लगा । महात्मा ज्यों के त्यों पड़े रहे और लड़के डर के मारे भाग गये । कोई एक पुरुष मंदिर में आया और उसने महात्मा के पट में रुधिर बहते देखा, तब उसने इधर-उधर से पूछा, तो उसको मालूम हुआ कि यह लड़कों ने किया है । तब दो चार आदमी मिलकर जर्राहि को बुला लाये । जब जर्राहि आकर जखम को हाथ लगाकर सीने लगा, तब महात्मा ने न सीने दिया । जब
१७८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
थोड़े दिनों के बाद जखम में कीड़े पड़ गये, तब भी महात्मा का चेहरा मैला न हुआ । उसी नगर में थोड़ी दूर पर मंदिर में एक और महात्मा रहते थे । उन्होंने जब उनका हाल सुना, तब एक आदमी की जबानी उन महात्मा को कहला भेजा कि भाई ! जिस मकान में आदमो रहता है, उस मकान में उसको झाड़ू-बुहारू देना आवश्यक होता है । जब ऐसा संदेश उनको पहुँचा, तब उन्होंने जवाब दिया कि महात्माजी से कहना कि जब आप तीर्थों में गये थे और राह में बीसों धर्मशालाओं में रात्रि-भर रहते गये थे, वे धर्मशाले अब गिर पड़े हैं, अब जाकर उनकी मरम्मत करिए। हमको तो शरीर-रूपी धर्मशाला में आयु-रूपी रात्रि भर रहना है। वह रात्रि भी व्यतीत हो गई है । अब इस शरीर-रूपी धर्मशाला की कौन मरम्मत करे । इतना कहकर फिर चुप हो गये । थोड़े दिनों के बाद उन्होंने शरीर का त्याग कर दिया, ऐसी दशा जीवन्मुक्तों की होती है ॥ ६ ॥
मूलम् ।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमहमेवेति निश्चयी । निर्विकल्प शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः ॥ ७ ॥
पदच्छेदः ।
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तम्, अहम्, एव, इति, निश्चयी, निर्विकल्पः, शुचिः, शान्तः, प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः ॥
ग्यारहवाँ प्रकरण । १७९
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| $आब्रह्मस्तम्ब-\atopपर्यन्तम्=ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यंत | च = और | ||
| शान्तः = शान्त-रूप | |||
| अहम् एव = मै ही हूँ | च = और | ||
| इति = इस प्रकार | $प्राप्ताप्राप्त-\atopविनिवृत्तः=लाभालाभ-रहित पुरुष | ||
| निश्चयी = निश्चय करनेवाला | |||
| निर्विकल्पः = संकल्प-रहित | +सुखीभवति = सुखी होता है ॥ | ||
| शुचि = शुद्ध |
भावार्थ ।
जीवन्मुक्तों के और लक्षणों को दिखलाते हैं—
ब्रह्मा से लेकर स्तंभर्यंत संपूर्ण जगत् मेरा ही रूप है, अर्थात् मैं ही सर्व-रूप हूँ, ऐसा निश्चय करनेवाला जो पुरुष है, वही निर्विकल्प समाधिवाला जीवन्मुक्त है, वही विषय-रूपी मल के सम्बन्ध से भी रहित है, वही शान्त चित्तवाला है, और वही प्राप्ताप्राप्त विषयों में इच्छा से रहित है, वही परम संतोषवाला है, वही अपने आत्मानंद करके ही पूर्ण है ॥ ७ ॥
मूलम् ।
नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी ।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
नानाश्चर्यम्, इदम्, विश्वम्, न, किञ्चित्, इति, निश्चयी निर्वासनः, स्फूर्तिमात्रः, न, किञ्चित्, इव, शाम्यति ॥
१८० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| इदम्= | यह | निश्चयी= | निश्चय करनेवाला |
| विश्वम्= | संसार | निर्वासनः= | वासना-रहित |
| नानाश्चर्य्यम्= | अनेक आश्चर्य्यवाला | स्फूर्तिमात्रः= | बोध-स्वरूप पुरुष |
| न किञ्चित्= | कुछ नहीं है अर्थात् मिथ्या है | न किञ्चिदिव= | व्यवहार-रहित |
| इति= | इस प्रकार | शाम्यति= | शान्ति को प्राप्त होता है |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**हे प्रभो ! ब्रह्मज्ञानी के मन के संकल्प कैसे स्वतः नष्ट हो जाते हैं ?
**उत्तर—**जब अधिष्ठान चेतन के साक्षात्कार होने से अध्यस्त वस्तु का बाध हो जाता है अर्थात् आत्मा के साक्षात्कार होने से जब नाना प्रकार के आश्चर्य-रूप विश्व का बाध हो जाता है, तब विद्वान् के मन के सर्व संकल्प दूर हो जाते हैं ।
**प्रश्न—**हे प्रभो ! यदि आत्मा के साक्षात्कार होने से जगत् का बाध अर्थात् नाश हो जाता है, तो फिर पञ्चभूतात्मक जगत् भी न रहता, और जगत् के नाश होने पर विद्वान् के देहादिक भी न रहते, पर ऐसा तो नहीं देखते हैं, इसी से जाना जाता है कि आत्मा के साक्षात्कार होने पर भी जगत् ज्यों का त्यों बना रहता है ?
**उत्तर—**नाश दो प्रकार का है । एक तो बाध-रूप नाश है, दूसरा निवृत्तिरूप नाश है ।
ग्यारहवां प्रकरण । १८१
उपादानेन सह कार्यविनाशो बाधः ॥ १ ॥
उपादानकारण के सहित जो कार्य का नाश है, उसका नाम बाध है ॥ १ ॥
विद्यमाने उपादाने कार्यविनाशो निवृत्तिः ॥ २ ॥
उपादान के विद्यमान होते हुए जो कार्य का नाश है, उसका नाम निवृत्ति है ॥ २ ॥
विद्वान् की दृष्टि से अज्ञान-रूपी कारण के सहित कार्य-रूपी जगत् का नाश हो जाता है । जगत् का नाश-रुप बाध हो जाता है; परन्तु बाधिता अनुवृत्ति करके बना रहता है, और स्वप्न-प्रपञ्च की निवृत्ति-रुप बाध जाग्रत् में हो जाता है, क्योंकि उसका उपादानकारण जो अविद्या है, वह बनी रहती है । कारण-रूपी अविद्या के विद्यमान होने पर स्वप्नरूपी कार्य का नाश हो जाता है, इसी से वह निवृत्ति-रूप बाध है ।
अज्ञान के अनेक अंश हैं । जिस विद्वान् के अंतःकरण-रूपी अंश का, जो अज्ञान का कार्य है, नाश हो जाता है, उसी को अपने आत्मा का साक्षात्कार हो जाता है, और बाकी के जीवों को नहीं होता है उनका जगत् भी बना रहता है । जैसे दश पुरुष सोये हुए अपने-अपने स्वप्नों को देखते हैं । उनमें से जिसकी निद्रा दूर हो गई है, उसी का स्वप्न प्रपंच नष्ट हो जाता है, बाकी के पुरुषों का बना रहता है । जिस पुरुष को ऐसा निश्चय हो गया है कि जगत्
१८२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अपनी सत्ता से शून्य हैं, ब्रह्म की सत्ता करके सत्यवत् भान होता है, वास्तव में मिथ्या है वही पुरुष शान्ति को प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां एकादश प्रकरणं समाप्तम् ॥
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