अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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ग्यारहवां प्रकरण । १७५
मूलम् ।
चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी ।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
चिन्तया, जायते, दुःखम्, न, अन्यथा, इह, इति, निश्चयी, तथा, हीनः, सुखी, शान्तः, सर्वत्र, गलितस्पृहः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| इह = | इस संसार में | सुखी = | सुखी और |
| चिन्तया = | चिन्ता से | शान्तः = | शान्त है |
| दुःखम् = | दुःख | सर्वत्रगलितस्पृहः = | सर्वत्र उसकी इच्छा गलित है |
| जायते = | उत्पन्न होता है | +च = | और |
| अन्यथा = | और प्रकार से | तथा = | उससे अर्थात् चिन्ता से |
| न = | नहीं | हीनः = | रहित है ॥ |
| इति = | ऐसा | ||
| निश्चयी = | निश्चय करनेवाला |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**कर्मों को करता हुआ पुरुष उनके फल के साथ लिपायमान क्यों नहीं होता है ? जो कर्ता होता है वही भोक्ता भी अवश्य होता है ?
**उत्तर—**इस संसार में पुरुष को चिन्ता करने से ही दुख उत्पन्न होता है, विना चिन्ता के दुःख नहीं होता है, जो इस प्रकार निश्चय करता है, वह चिन्ता को त्याग देता है,