अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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१७६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
और शान्तचित्त और स्थिर अन्तःकरणवाला होता है, और श्रम से रहित होकर भी कर्मों से जन्य अर्थों का भोगनेवाला नहीं होता है ॥ ५ ॥
मूलम् ।
नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी ।
कैवल्यमिव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम् ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
न, अहम्, देहः, न, मे, देहः, बोधः, अहम्, इति, निश्चयी, कैवल्यम्, इव, संप्राप्तः, न, स्मरति, अकृतम्, कृतम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहम् = | मैं | कैवल्यम् = | विदेह मुक्ति को |
| देहः = | शरीर | संप्राप्तः = | प्राप्त होता हुआ |
| न = | नहीं हूँ | निश्चयी = | निश्चय करनेवाला पुरुष |
| देहः = | देह | ||
| मे = | मेरा | अकृतं कृतम् = | अकृत और कृत कर्म को |
| न = | नहीं है | ||
| बोधोऽहम् = | ज्ञानस्वरूप हूँ | न स्मरति = | नहीं स्मरण करता है ॥ |
| इति = | इस प्रकार |
भावार्थ ।
पूर्वोक्त साधनों करके युक्त जो ज्ञानी हैं, उनकी दशा को दिखाते हैं—