भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

१२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

चला जाता है वैसे ही अंतःकरण के साथ आत्मा का तादात्म्य अध्यास होने से जब आत्मा के चेतन आदिक धर्म अंतःकरण में आ जाते हैं, और अंतःकरण के कर्त्तृत्व भोक्तृत्वादिक धर्म आत्मा में चले जाते हैं, तब पुरुष अपने आत्मा को कर्त्ता और भोक्ता मानने लग जाता है और उसी से जन्म-मरण-रूपी बंधन को प्राप्त होता है। जब आत्म-ज्ञान करके अपने को अकर्त्ता, अभोक्ता, शुद्ध और असंग मानता है और कर्त्तृत्वादिक अंतःकरण का धर्म मानता है, तब स्वयं साक्षी होकर अंतःकरण का भी प्रकाशक होता है, और तब ही अध्यास का नाश हो जाता है। अध्यास के नाश का नाम ही मुक्ति है। इसके अतिरिक्त मुक्ति कोई वस्तु नहीं है ॥ ४ ॥

जनकजी कहते हैं कि हे भगवन् ! नैयायिक एवं और भी आत्मा को कर्त्ता, भोक्ता और सुख दुखादिक धर्मोंवाला मानते हैं। एवं पुरुष भी कहता है—मैं कर्ता हूँ अर्थात् यज्ञादिक कर्मों का कर्ता और उनके फलों का भोक्ता भी अपने को मानता है। तब फिर यह जीवात्मा अकर्त्ता और अभोक्ता होकर मुक्त कैसे हो सकता है ? इसके उत्तर को अष्टावक्रजी कहते हैं—

मूलम् । न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचरः । असङ्गोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव ॥५॥

पदच्छेदः । न, त्वम्, विप्रादिकः, वर्णः, न, आश्रमी, न, अक्षगोचरः, असंगः, असि, निराकारः, विश्वसाक्षी, सुखी, भव ॥