अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 20, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला प्रकरण । १३
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| त्वम् = | तू | अक्षगोचरः = | आँख आदि इंद्रियों का विषय है |
| विप्रादिकः = | ब्राह्मण आदि | + परन्तु = | परंतु |
| वर्णः = | जाति | + त्वम् = | तू |
| न = | नहीं है | असङ्गः = | असंग (एवं) |
| + च = | और | निराकारः = | निराकार |
| न = | न (तू) | विश्वसाक्षी = | विश्व का साक्षी |
| आश्रमी = | चारों आश्रमवाला है | असि = | है |
| + च = | और | + इति मत्वा = | ऐसा जान करके |
| न = | न (तू) | सुखी = | सुखी |
| भव = | हो ॥ |
भावार्थ ।
निराकार सच्चिदानन्द-रूप एक ही निर्गुण आत्मा सर्वत्र व्यापक है । जैसे एक ही आकाश सर्वत्र व्यापक है । परंतु घट मठ आदि उपाधियों के भेद करके घटाकाश, मठाकाश ऐसा व्यवहार होता है और उपाधियों के भेद करके आकाश का भी भेद प्रतीत होता है, वास्तव में आकाश का भेद नहीं है । वैसे एक ही व्यापक आत्मा का अंतःकरण रूपी उपाधियों के भेद करके भेद प्रतीत होता है, वास्तव में आत्मा का भेद नहीं है । जैसे अनेक घटों में आकाश एक भी है, परंतु किसी घट में धूलि भरी है और किसी में धूम भरा है, और किसी में नील पीतादिक वर्णोंवाले पदार्थ भरे हैं, उन धूलि आदिकों के साथ यद्यपि कोई आकाश का वास्तविक सम्बन्ध नहीं है, तथापि धूल आदिकोंवाला प्रतीत होता है, वैसे आत्मा का भी अन्तःकरण और उसके धर्मों के साथ