भारतकोश
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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पहला प्रकरण । १३

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
त्वम् =तूअक्षगोचरः =आँख आदि इंद्रियों का विषय है
विप्रादिकः =ब्राह्मण आदि+ परन्तु =परंतु
वर्णः =जाति+ त्वम् =तू
न =नहीं हैअसङ्गः =असंग (एवं)
+ च =औरनिराकारः =निराकार
न =न (तू)विश्वसाक्षी =विश्व का साक्षी
आश्रमी =चारों आश्रमवाला हैअसि =है
+ च =और+ इति मत्वा =ऐसा जान करके
न =न (तू)सुखी =सुखी
भव =हो ॥

भावार्थ ।

निराकार सच्चिदानन्द-रूप एक ही निर्गुण आत्मा सर्वत्र व्यापक है । जैसे एक ही आकाश सर्वत्र व्यापक है । परंतु घट मठ आदि उपाधियों के भेद करके घटाकाश, मठाकाश ऐसा व्यवहार होता है और उपाधियों के भेद करके आकाश का भी भेद प्रतीत होता है, वास्तव में आकाश का भेद नहीं है । वैसे एक ही व्यापक आत्मा का अंतःकरण रूपी उपाधियों के भेद करके भेद प्रतीत होता है, वास्तव में आत्मा का भेद नहीं है । जैसे अनेक घटों में आकाश एक भी है, परंतु किसी घट में धूलि भरी है और किसी में धूम भरा है, और किसी में नील पीतादिक वर्णोंवाले पदार्थ भरे हैं, उन धूलि आदिकों के साथ यद्यपि कोई आकाश का वास्तविक सम्बन्ध नहीं है, तथापि धूल आदिकोंवाला प्रतीत होता है, वैसे आत्मा का भी अन्तःकरण और उसके धर्मों के साथ

१४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं है, तथापि परस्पर के अध्यास से वह सुख दुःखादिक धर्मोंवाला प्रतीत होता है । वस्तुतः आत्मा में सुख दुःखादिक तीनों काल में भी नहीं हैं ।

इसी वार्ता को अष्टावक्रजी जनकजी के प्रति कहते हैं कि हे जनक ! तू ब्राह्मण आदि जातियोंवाला नहीं है, और तू वर्णाश्रम आदिक धर्मोंवाला है, और न तू किसी चक्षुरादि इन्द्रिय का विषय है, किन्तु तू इन सबका साक्षी और असंग है एवं तू आकार से रहित है और तू संपूर्ण विश्व का साक्षी है—ऐसा तू अपने को जान करके सुखी हो अर्थात् संसाररूपी ताप से रहित हो ॥५॥

जनक जी कहते हैं कि हे भगवन् ! वेद ने जो वर्णाश्रमों के धर्म करने का विधान किया है, उनके त्याग करने से भी पुरुष पातकी होता है, और बिना अपने को कर्त्ता माने वे धर्म हो नहीं सकते हैं, अतएव यह “उभयतः पाशा रज्जु”—न्याय का प्रसंग कैसे दूर हो ?

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! वेद ने जितने वर्णाश्रमादिकों के धर्म कहे हैं, वे सब अज्ञानी मूर्ख के लिये कहे हैं, वे ज्ञानी के और मुमुक्षु के लिये नहीं हैं—

ज्ञानामृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः ।
नैवास्ति किञ्चित्कर्त्तव्यमस्ति चेन्न स तत्त्ववित् ॥१॥

जो आत्म-ज्ञान-रूपी अमृत करके तृप्त है और जो आत्म ज्ञान करके कृतकृत्य हो चुका है, उसको कुछ भी करने योग्य कर्म बाकी नहीं है । यदि वह अपने को कर्म करने-योग्य माने, तो वह आत्मवित् नहीं है । ऐसे ही अनेक वाक्य ज्ञानी

पहला प्रकरण । १५

के लिये कर्तव्यता का अभाव कथन करते हैं । गीता में जिज्ञासु के प्रति कर्मों का निषेध कहा है— जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्त्तते । भगवान् कहते हैं कि आत्म-ज्ञान का जिज्ञासु भी शब्द- ब्रह्म वेद की आज्ञा का उल्लंघन करके वर्त्तता है । अर्थात् जिज्ञासु के ऊपर भी कर्मकांड वेद-भाग की आज्ञा अज्ञानी और सकामी मूर्ख के ऊपर है । अतएव हे जनक ! यदि तू जिज्ञासु है तब भी तेरे ऊपर वर्णाश्रमों के धर्मों के करने की वेद की आज्ञा नहीं है । यदि तू लोकाचार के लिये करना चाहता है, तब उनको आत्मा से पृथक्, अन्तःकरण का धर्म मान करके तू कर ।

मूलम् । धर्माऽऽधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो । न कर्त्ताऽसि न भोक्ताऽसिमुक्त एवासि सर्वदा ॥६॥

पदच्छेदः । धर्माऽऽधर्मौ, सुखम्, दुःखम्, मानसानि, न, ते, विभो, न, कर्त्ता, असि, न भोक्ता, असि; मुक्तः, एव, असि, सर्वदा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
विभो=हे व्यापक !ते=तेरे लिये
मानसानि=मन सम्बन्धी=नहीं हैं
धर्माऽऽधर्मौ=धर्म और अधर्म+च=और
सुखम्=सुख=न
+च=और+त्वम्=तू
दुःखम्=दुःखकर्त्ता=कर्त्ता

१६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

असि=हैंसर्वदा=सदा
+ च=और+ त्वम्=न
न=नमुक्तः=मुक्त
+ त्वम्=तूएव=ही
भोक्ता=भोक्ताअसि=है ॥
असि=हैं (किन्तु)

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! धर्म और अधर्म, सुख और दुःखादिक ये सब मन के धर्म हैं, तुझ व्यापक आत्मा के नहीं। अर्थात् तेरा स्वरूप व्यापक है, उसके ये सब धर्म नहीं हैं, किन्तु परिच्छिन्न मन के सब धर्म हैं अतएव न तू कर्ता है और न भोक्ता है, किन्तु तू सर्वदा मुक्त-स्वरूप है ।। ६ ।।

फिर उसी वार्त्ता को दृढ़ करने के वास्ते अष्टावक्रजी कहते हैं—

मूलम् ।

एको द्रष्टाऽसि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा ।
अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम् ॥७॥

पदच्छेदः ।

एकः, द्रष्टा, असि, सर्वस्य, मुक्तप्रायः, असि, सर्वदा, अयम्, एवं, हि, ते, बन्धः, द्रष्टारम्, पश्यसि, इतरम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
सर्वस्य=सबकाअसि=तू है
एकः=एक+ च=और
द्रष्टा=देखनेवालाएव=ही

पहला प्रकरण । १७

ते=तेराअयम्=यह
बन्धः=बन्धन है+ त्वम्=तू
हि=जोइतरम्=दूसरे को
सर्वदा=निरंतरद्रष्टारम्=द्रष्टा
मुक्तप्रायः=अत्यन्त मुक्तपश्यसि=देखता है ॥
असि=तू है

भावार्थ ।

हे राजन् ! तू ही एक सच्चिदानन्द और परिपूर्णरूप से सबका द्रष्टा है और सर्वदा मुक्त-स्वरूप है । तेरे में तीनों काल में बंध नहीं है । जैसे सूर्य में तीनों काल में तम नहीं है, वैसे तू ही स्वयंप्रकाश और समस्त जगत् का द्रष्टा है। और जो तू अपने को द्रष्टा न जानकर अपने से भिन्न किसी को द्रष्टा मानता है, यही तेरे में बन्ध है ॥७॥

जनकजी कहते हैं कि हे भगवन् ! सारे संसार में सब लोग अपने से भिन्न कर्मों का साक्षी और द्रष्टा मानते हैं और अपने को कर्मों का कर्ता मानते हैं, तब फिर वे सब ऐसा क्यों मानते हैं ? और अपने से भिन्न द्रष्टा और कर्मों के फल के प्रदाता को क्यों मानते हैं ?

उत्तर—अष्टावक्रजी कहते हैं कि जो संसार में अज्ञानी मूर्ख हैं वे अपने से भिन्न द्रष्टा को और कर्मों के फल-प्रदाता को मानते हैं और अपने कर्मों का कर्त्ता और फल का भोक्ता मानते हैं, ज्ञानवान् ऐसा नहीं मानते हैं ।

मूलम् ।

अहं कर्त्तैत्यहंमानमहाकृष्णाहिदंशितः ॥
नाहं कर्त्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव ॥८॥

१८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः । अहम्, कर्त्ता, इति, अहम्मानमहाकृष्णाहिदंशितः, न, अहम्, कर्त्ता, इति, विश्वासामृतम्, पीत्वा, सुखी, भव ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्=मैंन कर्त्ता=नहीं कर्त्ता हूं ।
कर्त्ता=करता हूँइति=ऐसे
इति=ऐसेविश्वा- } विश्वासारूपी अमृत
अहंमान- } अहंकार-रूपी अत्यंतसामृतम् } =को
महाकृष्णा- } =कृष्ण वर्णवाले सर्प सेपीत्वा=पी करके
हिदंशितः } दंशित हुआ तूसुखी=सुखी
अहम्=मैंभव=हो ॥

भावार्थ । हे जनक ! "अहं कर्त्ता" मैं इस कर्म का कर्त्ता हूँ, एवं मैं इसके फल को भोगूँगा, यह जो अहंकार-रूपी काला सर्प है, इसी करके डसा हुआ, सारा संसार जन्म-मरण-रूपी चक्र में पड़कर भटकता रहता है और तू भी इस अहंकार-रूपी सर्प करके डसा हुआ, अपने को कर्त्ता और भोक्ता मानता है। उस अहंकार-रूपी सर्प के विपके उतारने के लिये "नाहं कर्त्ता" मैं कर्त्ता नहीं हूँ, जब ऐसे निश्चयरूपी अमृत को तू पान करेगा, तब तू सुखी होवेगा । अन्यथा किसी प्रकार से भी तू सुखी नहीं हो सकता है ॥८॥

जनकजी कहते हैं कि पूर्वोक्त अमृत को मैं कैसे पान करूँ ? इसके उत्तर को कहते हैं—

मूलम् । एको विशुद्धबुद्धोऽहमिति निश्चयवह्निना । प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव ॥९॥

पहला प्रकरण । १९

पदच्छेदः ।

एकः, विशुद्धबोधः, अहम्, इति, निश्चयवह्निना, प्रज्वाल्य, अज्ञानगहनम्, वीतशोक, सुखी, भव ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम् =मैंअज्ञान- गहनम्=अज्ञानरूपी-वन को
एकः =एकप्रज्वाल्य =जला करके
विशुद्धबोधः =अति शुद्ध बुद्ध-रूप हूँवीतशोकः =शोक-रहित हुआ
इति =ऐसे+ त्वम् =तू
निश्चय- वह्निना=निश्चय रूपी अग्निसुखी =सुखी
भव =हो

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! तू इस प्रकार के निश्चय-रूपी अमृत को पी करके, मैं एक हूँ अर्थात् सजातीय-विजातीय स्व-गत भेद से रहित हूँ । क्योंकि एक वृक्ष का जो वृक्षांतर से भेद है, वह सजातीय भेद कहा जाता है, और वृक्ष का जो घटादिकों से भेद है, उसका नाम विजातीय-भेद है और वृक्ष का जो अपने शाखादिकों से भेद है, वह स्व-गत भेद कहा जाता है ।

यह आत्मा तो ऐसा नहीं है, क्योंकि एक ही आत्मा सारे जगत् में व्यापक है । वह पारमार्थिक सत्तावाला है और नित्य है, इसके अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा नहीं है, इस वास्ते आत्मा में सजातीय-भेद नहीं है । और परिच्छिन्न व्यावहारिक सत्तावालों में सजातीय-भेद रहता है, और आत्मा से भिन्न कोई भी पदार्थ पारमार्थिक सत्तावाला नहीं

२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

है, अतएव आत्मा से भिन्न सब मिथ्या है, क्योंकि कहा गया है— ब्रह्मभिन्नम्, सर्वं मिथ्या, ब्रह्मभिन्नत्वात् । ब्रह्म से भिन्न सारा जगत् ब्रह्म से पृथक् होने के कारण शक्ति में रजत की तरह मिथ्या है, इस अनुमान-प्रमाण से जगत् का मिथ्यात्व सिद्ध होता है । और इसी से आत्मा में विजातीय-भेद भी नहीं है । आत्मा निश्चय है, इस वास्ते उसमें स्व-गत भेद भी नहीं है क्योंकि स्व-गत भेद सावयव पदार्थों में होता है । आत्मा देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है, क्योंकि देश, काल और वस्तु का परिच्छेद परिच्छिन्न पदार्थ में ही रहता है, व्यापक में नहीं रहता है ।

जो वस्तु किसी काल में हो और किसी काल में न हो, वह वस्तु काल-परिच्छेदवाली कहलाती है, ऐसे घटपटादिक पदार्थ ही हैं, आत्मा तो तीनों कालों में एक-सा ज्यों का त्यों बना रहता है, इस वास्ते काल-परिच्छेद से आत्मा रहित है ।

जो वस्तु एक देश में हो और दूसरे देश में न हो, वह देश-परिच्छेदवाली कहलाती है, ऐसे घटपटादिक पदार्थ ही हैं, आत्मा तो सब देश में है, इस वास्ते वह देश परिच्छेद से भी रहित है ।

जो एक वस्तु दूसरी वस्तु में न रहे, वह वस्तु परिच्छेद कहलाता है, जैसे घट, पट में नहीं रहता है और पट, घट में नहीं रहता है, परन्तु आत्मा सब वस्तुओं में ज्यों का त्यों एक-रस रहता है, इस वास्ते वह वस्तु परिच्छेद से भी रहित है ।

पहला प्रकरण । २१

हे जनक ! जो देश, काल और वस्तु-परिच्छेद से रहित, नित्य और व्यापक है, वह एक ही सिद्ध होता है, और वही तेरा आत्मा है। अतएव हे राजन् ! तू ऐसा निश्चय कर ले कि मैं ही सर्वज्ञ व्यापक हूँ, और सजातीय-विजातीय स्व-गत भेद से रहित हूँ, और विशेष करके शुद्ध हूँ अर्थात् अविद्या आदिक मल मेरे में नहीं हैं। जब तू ऐसे निश्चय-रूपी अग्नि को प्रज्वलित करके अज्ञान-रूपी वन को भस्म कर देगा, तो फिर जन्म-मरण-रूपी शोक से रहित होकर परमानन्द को प्राप्त होवेगा ॥९॥

जनकजी कहते हैं कि हे महाराज ! पूर्वोक्त निश्चय करने से भी तो जगत् सत्य ही दिखाई पड़ता है, इसकी निवृत्ति अर्थात् अभाव स्वरूप से कदापि नहीं होती है, और जब तक इसका अभाव न हो, तब तक शोक से रहित होना कठिन है ?

मूलम् ।

यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत् ।
आनन्दपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं चर ॥१०॥

पदच्छेदः ।

यत्र, विश्वम्, इदम्, भाति, कल्पितम्, रज्जुसर्पवत्, आनन्दपरमानन्दः, सः, बोधः, त्वम्, सुखम्, चर ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यत्र=जिसमेंविश्वम्=संसार
इदम्=यहरज्जुसर्पवत्=रज्जु में सर्प के सदृश
कल्पितम्=कल्पितभाति=भासता रहता है

२२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

\begin{aligned} सः &= वही & त्वम् &= तू है ( अतएव तू ) \ आनन्द- परमानन्द &= आनन्दपरमानन्द & सुखम् &= सुख-पूर्वक \ बोधः &= बोध रूप & चर &= विचर ॥ \end{aligned}

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! जिस ब्रह्म-आत्मा में यह जगत् रज्जु में सर्प की तरह कल्पित प्रतीत होता है, वह आत्मा आनन्द-स्वरूप है। जैसे रज्जु के अज्ञान करके, मंद अंधकार में रज्जु ही सर्प-रूप प्रतीत होती है, या रज्जु में सर्प प्रतीत होता है। वास्तव में न तो रज्जु सर्प-रूप है और न रज्जु में सर्प है। और न रज्जु में सर्प पूर्व था और न आगे होवेगा और न वर्तमान काल में है, किन्तु रज्जु के अज्ञान करके और मन्द अन्धकार आदि सहकारी कारणों द्वारा पुरुष को भ्रान्ति से रज्जु में सर्प प्रतीत होता है, और उसी मिथ्या-सर्प को देख करके पुरुष भागता, गिर पड़ता और डरता है। जब कोई रज्जु का ज्ञाता उससे कहता है कि यह सर्प नहीं है, किन्तु रज्जु है, इसको तू क्यों डरता है, तब उसके भ्रम और भय आदि सब दूर हो जाते हैं। वैसे ही आत्मा के स्वरूप के अज्ञान करके पुरुष को जगत् भासता है, एवं जन्म-मरण के भय आदिक भी भासते हैं। जब ब्रह्म-वित् गुरु उपदेश करता है कि तू ही ब्रह्म है, तेरे को अपने स्वरूप के अज्ञान के कारण यह जगत् प्रतीत हो रहा है और वास्तव में यह जगत् मिथ्या है एवं तीनों कालों में तेरे लिये नहीं है। जैसे निद्रा-रूपी दोष करके पुरुष स्वप्न में अनेक प्रकार के सिंह-व्याघ्रादिकों को रचता है, और आप ही

पहला प्रकरण । २३

उनसे भय को प्राप्त होता है । जब निद्रा दूर हो जाती है, तब उन कल्पित सिंहादिकों का भी नाश हो जाता है, वैसे ही हे जनक ! तेरे ही अज्ञान करके यह संपूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, और जब तू अपने स्वरूप को यथार्थ रूप से जान लेवेगा, तब जगत् का भी अभाव हो जावेगा ।

**प्रश्न—**हे भगवन् ! यदि आत्म-ज्ञान करके अज्ञान और अज्ञान के कार्य-रूप जगत् का नाश हो जाता, तब तो अब तक जगत् न बना रहता, क्योंकि बहुत ज्ञानवान् हो चुके हैं, उनमें से एक के ज्ञान करके कारण के सहित कार्य-रूपी जगत् का यदि नाश हो जाता, तब तों फिर अस्मदादिक सब जीव और वृक्षादिक सृष्टि भी न होती, परन्तु ऐसा तो नहीं देखते हैं, किन्तु जगत् ज्यों का त्यों ही बना है, तब फिर आप कैसे कहते हैं कि अज्ञान के नाश से जगत् का नाश हो जाता है ?

**उत्तर—**अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! जैसे जल की इच्छा करके पुरुष मरु-मरीचिका के जल को देखकर उसके पास जाने का उद्योग करता है, परन्तु जब आगे उसको जल नहीं मिलता है, तब किसी के बताने से जान लेता है कि यह भ्रम करके जो जल मुझे दिखाई देता था, वह जल नहीं है । तब आकर वृक्ष के नीचे बैठ जाता है और फिर जब उधर को देखता है, तब फिर जल पहले की तरह दिखाई पड़ता है, परन्तु जल की इच्छा करके फिर उस तरफ नहीं दौड़ता है, और न दुःखी होता है, वैसे ही जिसको आत्म-ज्ञान हुआ है, और जिसने जान लिया है कि जगत् मिथ्या है और भ्रम करके प्रतीत होता है, वह फिर दुःखी

२४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

नहीं होता है, और न उसमें उसकी आसक्ति होती है, किन्तु यावत् जगत् है, उस सबको मिथ्या जानता है। उस मिथ्यात्व के निश्चय का नाम ही जगत् का नाश है। यद्यपि स्वरूप से इसका कदापि नाश नहीं होता है, किन्तु यह अथाह-रूप से सदा बना ही रहता है, हे जनक ! जिसने अपने आत्मा को सत्, चित् और आनन्द-रूप करके जान लिया है, वह फिर जन्म-मरण-रूपी बन्ध को नहीं प्राप्त होता है। हे जनक ! तू अपने को ही आनन्दरूप और परमानन्द बोध-स्वरूप अर्थात् ज्ञान-स्वरूप जान, और सुख से विचर ॥ प्रश्न—हे भगवन् ! अज्ञान एक है या अनेक हैं ? उत्तर—अज्ञान एक है । प्रश्न—जब अज्ञान एक है, तब एक अज्ञान के नाश होने से उसके कार्य जगत् का भी स्वरूप से ही नाश हो जाना चाहिए ? उत्तर—यद्यपि अज्ञान एक ही है, तथापि उसके कार्य तन्मात्रा, और तन्मात्रा का कार्य अन्तःकरण-रूपी भाग अनन्त हैं। जैसे आकाश एक है, पर अनेक घट-रूपी उपा- धियों के साथ वह अनेक भेद को प्राप्त हो रहा है। और जब घट-रूपी उपाधि नष्ट हो जाती है, तब वही घटाकाश महाकाश में मिल जाता है, वैसे ही जिस अन्तःकरण में ज्ञान- रूपी प्रकाश उदय होता है, वही अन्तःकरण नाश को प्राप्त हो जाता है, और वही जीव, जो अब तक बन्धन में था, मुक्त हो जाता है, बाकी सब बन्ध में पड़े रहते हैं ॥ जैसे सोये हुए दस पुरुष अपने-अपने स्वप्नों को देखते हैं, और जिसकी निद्रा दूर हो जाती है, उसी का स्वप्न नष्ट

पहला प्रकरण । २५

हो जाता है, और लोग अपने-अपने स्वप्नों को देखते ही रहते हैं। अतएव हे राजन् ! अब तू अज्ञान-रूपी निद्रा से जाग, और अपने ज्ञान-स्वरूप को प्राप्त होकर सुख-पूर्वक संसार में विचर ॥१०॥

**प्रश्न—**जब सारा जगत् रज्जु में सर्प की तरह कल्पित है, और मिथ्या है, तब फिर बन्ध और मोक्ष पुरुष को कैसे हो सकते हैं ?

मूलम् ।

मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि ।
किंवदन्तीय सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत् ॥ ११ ॥

पदच्छेदः ।

मुक्ताभिमानी, मुक्तः, हि बद्धः बद्धाभिमानी, अपि, किंवदन्ती, इह, सत्या, इयम्, या, गतिः, सा गति, भवेत् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
मुक्ताभिमानी=मुक्ति का अभिमानीकिंवदन्ती=लोक-वाद
मुक्त=मुक्त हैसत्या=सत्य है कि
बद्धाभिमानी=बद्ध का अभिमानीया=जैसी
बद्ध=बद्ध हैमतिः=मति है
हि=क्योंकिसा=वैसी ही
इह=इस संसार मेंगतिः=गति
इयम्=यहभवेत्=होती है

भावार्थ ।

हे जनक ! बन्ध का कारण अभिमान है—
ब्राह्मणोऽहम्, क्षत्रियोऽहम्, वैश्योऽहम्, शूद्रोऽहम् ।

२६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अर्थात् मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्रिय हूँ, मैं वैश्य हूँ, मैं शूद्र हूँ, जैसा-जैसा जिसको अभिमान होता है, वैसे-वैसे वह कर्मों को करके, उनके फलों का भोग करता है और एक जन्म से दूसरे जन्म को प्राप्त होता है, और वही बन्धायमान कहा जाता है। और जिसको ऐसा अनुभव है—

नाहं ब्राह्मणः, न क्षत्रियः।

अर्थात् न मैं ब्राह्मण हूँ, न क्षत्रिय हूँ, न वैश्य हूँ, न शूद्र हूँ, किन्तु—

शुद्धोऽहम्, निरञ्जनोऽहम्, निराकारोऽहम्, निर्विकल्पोऽहम्।

अर्थात् मैं शुद्ध हूँ, माया-मल से रहित हूँ, आकार से भी रहित हूँ, विकल्प से भी रहित हूँ और नित्य-मुक्त हूँ।

बंध और मोक्ष ये सब मन के धर्म हैं। मुझमें ये सब तीनों काल में नहीं हैं, किन्तु मैं सबका साक्षी हूँ, ऐसे अभिमानवाला पुरुष नित्य-मुक्त है। इसी वार्ता को अन्यत्र भी कहा है—

देहाभिमानाद्यत्पापं नतद्गोवधकोटिभिः।
प्रायश्चित्ताद्भवेच्छुद्धिर्नृणां गोवधकारिणाम् ॥१॥

अर्थात् जो देह के अभिमान से पुरुषों को पाप होता है, वह पाप करोड़ों गौओं के वध करने से भी नहीं होता है, क्योंकि करोड़ों गौओं के वध करनेवाले की शुद्धि के लिए शास्त्र में प्रायश्चित लिखा है, अर्थात् प्रायश्चित्त करके करोड़ों गौओं का वध करनेवाला भी शुद्ध हो सकता है, परन्तु देहाभिमानी की शुद्धि के लिए शास्त्र में कोई भी प्रायश्चित्त नहीं लिखा है, इसी वास्ते जाति, वर्ण आदि जो देह के धर्म हैं, उन धर्मों को जो आत्मा में मानते हैं, वे ही

पहला प्रकरण । २७

देहाभिमानी कहे जाते हैं, और वे ही सदा बन्धायमान रहते हैं । और जो जाति और वर्णों के धर्मों को आत्मा में नहीं मानते हैं, किन्तु अपने आत्मा को असग, नित्य-मुक्त और शुद्ध मानते हैं, वे नित्य ही मुक्त हैं, क्योंकि हे राजन् ! शास्त्रों में दो दृष्ट कही गई हैं—एक तो शास्त्र दृष्ट, दूसरी लौकिक दृष्ट । शास्त्र-दृष्ट से तो देहादि के चर्म के अभिमानी का नाम ही चमार है, क्योंकि अपने को चर्म का अभिमानी मानता है—

“देहोऽहम्”

और जो चर्म के अभिमान से रहित है, वही अपने को देहादिकों से भिन्न, नित्य शुद्ध और बुद्ध मानता है, वही मुक्त है ।

एवं लोग भी कहते हैं कि जैसी जिसकी मति अर्थात् बुद्धि अन्तकाल में होती है, वैसी ही उसकी गति होती है । अर्थात् जैसा जिसका निश्चय होता है, वैसा ही उसको फल प्राप्त होता है अतएव हे राजन् ! तू भी अपने को शुद्ध, बुद्ध और मुक्त-रूप निश्चय कर ॥११॥

जनकजी कहते हैं कि हे भगवन् ! जीवात्मा को जो बन्ध और मोक्ष हैं, वे दोनों वास्तव में हैं ? या अवास्तविक हैं ? यदि बन्ध वास्तव में हो, तब तो उसकी निवृत्ति कदापि न होनी चाहिए ? यदि मोक्ष ही वास्तविक हो, तो जीव को बन्ध कदापि न होना चाहिए ?

इस शंका के उत्तर को आगेवाले वाक्य करके अष्टावक्रजी कहते हैं—

२८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् ।

आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः ।
असङ्गो निःस्पृहःशान्तो भ्रमात्संसारवानिव ॥१२॥

पदच्छेदः ।

आत्मा, साक्षी, विभुः, पूर्णः, एकः, मुक्तः, चित्, अक्रियः,
असंगः, निस्पृहः, शान्तः, भ्रमात्, संसारवान्, इव ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
आत्मा = आत्माअक्रियः = क्रिया-रहित है
साक्षी = साक्षी हैअसंगः = संग-रहित है
विभुः = व्यापक हैनिःस्पृहः = इच्छा-रहित है
पूर्णः = पूर्ण हैशान्तः = शान्त है
एकः = एक हैभ्रमात् = भ्रम के कारण
मुक्तः = मुक्त हैसंसारवान् = संसारवाला
चित् = चैतन्य-रूप हैइव = भासता है

भावार्थ ।

हे जनक ! बन्ध और मोक्ष दोनों अवास्तविक हैं और केवल अपने स्वरूप की अज्ञानता से देहादिकों में अभिमान करके, जीव अपने को बन्धायमान करके, मुक्त होने की इच्छा करता है । वास्तव में न उसमें बन्ध है और न मोक्ष है । जीव-आत्मा है, एक है, पूर्ण है, मुक्त है, असंग है, निःस्पृह है और शान्त है । भ्रम करके संसारवाला भान होता है । वास्तव में, उसमें संसार तीनों कालों में नहीं है, इसमें एक दृष्टांत कहते हैं—

पहला प्रकरण । २९

एक पुरुष का नाम बेवकूफ था और उसकी स्त्री का नाम फजीती था । एक दिन उसकी स्त्री उसके साथ लड़ाई झगड़ा करके कहीं चली गई । तदनंतर वह स्त्री खोजने के लिए जंगल में गया । वहाँ पर एक तपस्वी उसको मिला और उससे पूछा कि तू जंगल में क्यों घूमता है ? उसने कहा कि मैं अपनी स्त्री को खोजता हूँ । तब उस तपस्वी ने कहा कि तुम्हारी स्त्री का क्या नाम है ? और तुम्हारा क्या नाम है ? तब उसने कहा कि मेरा नाम बेवकूफ है, और मेरी स्त्री का नाम फजीती है । तब उसने कहा “बेवकूफ” को फजीतियों की क्या कमती है ? जहाँ पर जावेगा, वहाँ पर उस बेवकूफ को फजीती मिल जावेगी ।

दाष्टांत में जब तक जीव अज्ञानी मूर्ख बना है, तबतक इसको जन्म-मरण-रूपी फजीतियों की क्या कमती है । जब ज्ञानवान् होगा तब बंध से रहित हो जावेगा ।

जनकजी कहते हैं कि हे भगवन् ! नैयायिक लोग आत्मा का वास्तविक बंध-मोक्ष मानते हैं, उनका मानना ठीक है या नहीं ?

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! नैयायिक आदिकों का कथन सर्व-युक्ति और वेद से विरुद्ध है । यदि आत्मा को वास्तविक बंध होता, तब उसकी निवृत्ति कदापि न होती, और साधन भी सब व्यर्थ हो जाते, पर ऐसा तो नहीं है, क्योंकि वेद उसकी निवृत्ति को लिखता है और आत्मा वास्तव में संसारी नहीं है । इसी में दस हेतुओं को दिखाते हैं—

( १ ) अहंकार आदिकों का भी आत्मा साक्षी है, पर कर्ता नहीं है ।

३० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

( २ ) आत्मा विभु अर्थात् सर्व का अधिष्ठान है । ( ३ ) आत्मा एक है अर्थात् सजातीय और विजातीय स्वगत-भेद से रहित है । ( ४ ) आत्मा मुक्त है अर्थात् माया और माया के कार्य देहादिकों से भी रहित है । ( ५ ) आत्मा चित् है अर्थात् चैतन्य-स्वरूप है । ( ६ ) आत्मा अक्रिय है अर्थात् चेष्टा से रहित है, क्योंकि परिच्छिन्न में चेष्टा अर्थात् क्रिया होती है, व्यापक में नहीं होती है । ( ७ ) आत्मा असंग है अर्थात् सम्पूर्ण सम्बन्धों से रहित है । ( ८ ) आत्मा निःस्पृह है अर्थात् विषयों की अभिलाषा से भी रहित है । ( ९ ) आत्मा शान्त है अर्थात् प्रवृत्ति और निवृत्ति देहादि अन्तःकरण के धर्मों से रहित है । ( १० ) आत्मा केवल भ्रम के कारण संसारवाला भासित होता है । इन दस हेतुओं करके आत्मा वास्तव में संसारी नहीं हो सकता है । “असंगो ह्ययं पुरुषः” । यह आत्मा असंग है । “न जायते म्रियते वा कदाचित्” । अर्थात् आत्मा वास्तव में न जन्म लेता है, न मरता है—यह गीता-वाक्य और अनेक श्रुति-वाक्य भी आत्मा की असंगता में प्रमाण हैं । इसी से नैयायिक आदि मिथ्यावादी सिद्ध होते हैं ॥ १२ ॥

पहला प्रकरण । ३१

मैं परिच्छिन्न हूँ, मेरे ये देहादिक हैं, मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ, इस तरह के जो अन्तःकरण के धर्मों को अध्यास करके आत्मा में जीवों ने मान रक्खा है, उस अध्यास-रूपी भ्रम की निवृत्ति तो एक बार असंग आत्मा के उपदेश करने से नहीं होती है । इसी पर व्यास भगवान् ने सूत्र कहा है— “आवृत्तिरसकृदुपदेशात् ।”

ज्ञान की स्थिति के लिये श्रवण-मनन आदिकों की आवृत्ति पुनःपुनः करे, क्योंकि उद्दालक ने अपने पुत्र के प्रति, नव बार ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य का उपदेश किया है, बारंबार श्रवणादिकों के करने से चित्त की वृत्ति विजातीय भावना का त्याग करके सजातीय भावनावाली होकर आत्माकार हो जाती है, इसी वास्ते जनकजी को पुनः-पुनः आत्म-ज्ञान का उपदेश अष्टावक्रजी करते हैं—

मूलम् ।

कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय ।
आभासोऽहं भ्रमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम् ॥ १३ ॥

पदच्छेदः ।

कूटस्थम्, बोधम्, अद्वैतम्, आत्मानम्, परिभावय, आभासः, अहम्, भ्रमम्, मुक्त्वा, भावम्, बाह्यम्, अथ, अन्तरम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम् =मैंइति =ऐसे
आभासः =आभास-रूप अहंकारी जीव हूँभ्रमम् =भ्रम को
अथ =और

३२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

बाह्यम्=बाहरकूटस्थम्=कूटस्थ
अन्तरम्=भीतरबोधम्=बोध-रूप
भावम्=भाव कोअद्वैतम्=अद्वैत
मुक्त्वा=छोड़ करकेआत्मानम्=आत्मा को
त्वम्=तूपरिभावय=विचार कर ॥

भावार्थ ।

हे जनक ! "मैं आभास हूँ" "मैं अहंकार हूँ" इस भ्रम का त्याग करके और जो बाहर के पदार्थों में ममता हो रही है कि 'यह मेरा शरीर है' 'मेरे ये कान नाक आदिक हैं' इन सबमें—'अहं' और 'मम' भावना का त्याग करके और अन्तर अन्तःकरण के धर्म जो सुख दुःखादिक हैं, उनमें जो तुझको अहंभावना हो रही है, उसका त्याग करके आत्मा को अकर्त्ता, कूटस्थ, असंग, ज्ञान-स्वरूप, अद्वैत और व्यापक निश्चय कर ॥ १३ ॥

जनकजी प्रार्थना करते हैं कि हे महाराज ! अनादि काल का जो देहादिकों में अभिमान हो रहा है, वह एक बार के उपदेश से दूर नहीं हो सकता है, अतएव आप पुनः-पुनः मेरे को उपदेश करिये ताकि श्रवण करके मेरा देहादि अभिमान दूर हो जावे ।

इस प्रश्न को सुनकर अष्टावक्रजी फिर आत्म-विद्या के उपदेश को करते हैं—

मूलम् ।

देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक । बोधोऽहं ज्ञानखङ्गेन तन्निष्कृत्य सुखीभव ॥ १४ ॥