भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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बारहवाँ प्रकरण । १८७

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
हे ब्रह्मन्=हे प्रभो !अभावात्=अभाव से
हेयोपादेयविरहात्=त्याज्य और ग्राह्य वस्तु के वियोग सेअद्य=अब
अहम्=मैं
एवम्=वैसे हीएवम् एव=जैसा हूँ वैसा ही
हर्षविषादयोः=हर्ष और विषाद केआस्थितः=स्थित हूँ

भावार्थ ।

जनकजी फिर अपने अनुभव को कहते हैं कि हे प्रभो ! त्यागने-योग्य और ग्रहण करन योग्य वस्तु का अभाव होने से अर्थात् आत्म-ज्ञान की प्राप्ति होने से न तो मेरे को कुछ त्याग करने-योग्य रहा है, और न कुछ ग्रहण करने के योग्य रहा है, इसी वास्ते हर्ष विषादादिक भी मेरे को नहीं हैं, क्योंकि हर्ष विषादादिक भी ग्रहण और त्याग करने से ही होते हैं, इस वास्ते अब मैं अपने स्वरूप में ही स्थित हुआ हूँ ॥ ४ ॥

मूलम् ।

आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम् ।
विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।

आश्रमानाश्रमम्, ध्यानम्, चित्तस्वीकृतवर्जनम्, विकल्पम्, मम, वीक्ष्य, एतैः, एवम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥