भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 195, कुल 405 में से

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पृष्ठ 195

१८८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
+ यत्=जोएतैः=उन सबसे
आश्रमाना-श्रमम्=आश्रम और अनाश्रम हैउत्पन्नः=उत्पन्न हुए
मम=अपने
ध्यानम्=ध्यान हैविकल्पम्=विकल्प को
च=औरवीक्ष्य=देख करके
अहम्=मैं
चित्तस्वीकृत-वर्जनम्=चित्त से स्वीकार की हुई वस्तु का त्याग हैएवम्=इन तीनों से रहित
आस्थितः=स्थित हुआ हूँ

भावार्थ ।

शिष्य कहता है कि हे गुरो ! आश्रमों के धर्मों से और उनके फलों के सम्बन्ध से भी मैं रहित हूँ । अनाश्रमी जो त्यागी संन्यासी है, उनके धर्म जो दण्डादिकों का धारण करना है, उनके सम्बन्ध से भी मैं रहित हूँ और योगियों के धर्म जो धारणा ध्यानादिक हैं, उनसे भी मैं रहित हूँ, क्योंकि ये सब अज्ञानियों के लिये बने हैं, मैं इन सबका साक्षी चिद्रूप हूँ ।

यः शरीरेन्द्रियादिभ्यो विभिन्नं सर्वसाक्षिणम् ।
पारमार्थिकविज्ञानं सुखात्मानं च स्वप्रभम् ॥ १ ॥
परं तत्त्वं विजानाति सोऽतिवर्णाश्रमी भवेत् ॥ २ ॥

जो पुरुष शरीर इन्द्रियादिकों से भिन्न और शरीरादिकों के साक्षी विज्ञान-स्वरूप, सुख-स्वरूप, स्वयंप्रकाश परम तत्त्व अपने आत्मा को जान लेता है, वह अतिवर्णाश्रमी कहलाता है। सो मैं वर्णाश्रमों से अतीत सबका साक्षी चिद्रूप हूँ ॥ ५ ॥

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