अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 196, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 196
बारहवाँ प्रकरण । १८९
मूलम् ।
कर्माऽनुष्ठानमज्ञानाद्यथैवोपरमस्तथा ।
बुद्ध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
कर्माऽनुष्ठानम्, अज्ञानात्, यथा, एव उपरमः, तथा,
बुद्ध्वा, सम्यक्, इदम्, तत्त्वम्, एव, अहम्, आस्थितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यथा | =जैसे | सम्यक् | =भली प्रकार |
| कर्मानुष्ठानम् | =कर्म का अनुष्ठान | बुद्ध्वा | =जान करके |
| अज्ञानात् | =अज्ञान से है | अहम् | =मैं |
| तथा | =वैसा ही | एवम् एव | =कर्म करने और कर्म न करने की इच्छा को त्याग करके |
| उपरमः | =कर्म का त्याग | ||
| एव | =भी है | ||
| इदम् | =इस तत्त्व को | आस्थितः | =स्थित हूँ |
भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि कर्मों का अनुष्ठान अज्ञानता से होता है, अर्थात् जिसको आत्मा के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं है, वही कर्मों का अनुष्ठान स्वर्गादि फल की प्राप्ति के लिये करता है, और आत्मा के ज्ञान से ही पुरुष कर्म करने से उपराम को भी प्राप्त हो जाता है । जिसका आत्मा का साक्षात्कार हो गया है, वह न कर्म करता है, और न उनसे उपराम होता है, प्रारब्ध-वश से शरीरादिक कर्मों को