अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 200, कुल 405 में से
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तेरहवाँ प्रकरण
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मूलम् ।
अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम् । त्यागादानेविहायास्मादहमासेयथासुखम् ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
अकिञ्चनभवम्, स्वास्थ्यम्, कौपीनत्वे, अपि, दुर्लभम्, त्यागादाने, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अकिञ्चनभवम्= नहीं है कुछ, ऐसे विचार से पैदा हुई | अस्मात्=इस कारण से |
| स्वास्थ्यम्= जो चित्त की स्थिरता, सो | त्यागादाने= त्याग और ग्रहण को |
| कौपीनत्वे= कौपीन के धारण करने पर | विहाय=छोड़ करके |
| अपि=भी | अहम्=मैं |
| दुर्लभम्=दुर्लभ है | यथासुखम्=सुख-पूर्वक |
| आसे=स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ ।
इस त्रयोदश प्रकरण में जीवन्मुक्त के फल का निरूपण करते हैं—