अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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१९४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
संपूर्ण विषयों में जा आसक्ति है, उस आसक्ति के त्याग
करने से जो चित्त की स्थिरता हुई है, वह स्थिरता कौपीन- मात्र में आसक्ति करने मे नहीं होती है, ऐसी स्थिरता अति दुर्लभ है । इसी कारण मे शिष्य कहता है कि पदार्थों के त्याग करने में और ग्रहण करने में जो आसक्ति है, उसको भी त्याग करके आत्मानंद में स्थित हूँ ॥ १ ॥
मूलम् । कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते । मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम् ॥ २ ॥
पदच्छेदः । कुत्र, अपि, खेदः, कायस्य, जिह्वा, कुत्र, अपि, खिद्यते, मनः, कुत्र, अपि, तत्, त्यक्त्वा, पुरुषार्थे, स्थितः, सुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कुत्र अपि = | कहीं तो | मनः = | मन |
| कायस्य = | शरीर का | खिद्यते = | खेद करता है |
| खेदः = | दुःख है | अतः = | इससे |
| कुत्र अपि = | कहीं | तत् = | तीनों को |
| जिह्वा = | वाणी | त्यक्त्वा = | त्याग करके |
| खिद्यते = | दुःखी है | सुखम् = | सुख-पूर्वक |
| कुत्र अपि = | कहीं | स्थितः = | स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ । शारीरिक कर्मों में शरीर को खेद होता है, अर्थात् शरीर के जो कर्म चलना-फिरना, सोना-जागना, लेना-देना,