अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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तेरहवाँ प्रकरण । १९५
ग्रहण-त्यागादिक हैं, उनके करने में शरीर को ही खेद होता है, और वाणी के कर्म जो सत्य मिथ्या भाषणादिक हैं, उनके करने में जिह्वा को खेद होता है, और मन के कर्म जो संकल्प-विकल्पनादिक का ध्यान-धारणादिक हैं उनके करने में मन को खेद होता है, इसलिये शिष्य कहता है कि उन तीनों के कर्मों का त्याग करके मैं अपने आत्मानन्द में स्थित हूँ ॥ २ ॥
मूलम् ।
कृतं किमपि नैव स्यादिति संचिन्त्य तत्त्वतः ।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वाऽऽसे यथासुखम् ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
कृतम्, किम्, अपि, न, एव, स्यात्, इति, संचिन्त्य, तत्त्वतः, यदा, यत्, कर्तुम्, आयाति, तत्, कृत्वा, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कृतम् = | $\Big{$ शरीर आदि करके किया हुआ कर्म | संचिन्त्य = | विचार करके |
| किमपि = | कुछ भी | यदा = | जब |
| एव = | वास्तव में | यत् = | जो कुछ कर्म |
| न आत्मकृतम् = | $\Big{$ आत्मा करके नहीं किया हुआ | कर्तुम् = | करने को |
| स्यात् = | होय है | आयाति = | आ पड़ता है |
| इति = | ऐसा | तत् = | उसको |
| तत्त्वतः = | यथार्थ | कृत्वा = | करके |
| यथासुखम् = | सुख-पूर्वक | ||
| आसे = | मैं स्थित हूँ ॥ |