अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 203, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें१९६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
**प्रश्न—**कायिक, वाचिक और मानसिक कर्मों में त्याग होने से शरीर का भी त्याग हो जावेगा; क्योंकि बिना कर्मों के भोजनादिक क्रिया का त्याग होगा और बिना भोजन के शरीर रहेगा नहीं ?
**उत्तर—**शरीर और इन्द्रियादिकों करके किया हुआ जो कर्म है, वह वास्तव में आत्मा करके किया हुआ नहीं होता है। ऐसे चिंतवन करके विद्वान् को जब शरीरादिकों के खान-पानादिक कर्म करने पड़ते हैं, तब वह अहंकार से रहित होकर उन कर्मों को करता हुआ भी अपने सुख-स्वरूप में ही रहता है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
कर्मनैष्कर्म्यनिर्वंधभावा देहस्थयोगिनः । संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम् ॥ ४ ॥
पदच्छेदः ।
कर्मनैष्कर्म्यनिबन्धभावाः, देहस्थयोगिनः, संयोगायोग-विरहात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कर्मनैष्कर्म्यनिबन्धभावा = | कर्म और निष्कर्म के बंधन से संयुक्त स्वभाववाले | संयोगायोगविरहात् = | देह के संयोग और वियोग के पृथक् होने के कारण |
| देहस्थयोगिनः = | देह विषे आसक्त योगी हैं | यथासुखम् = | सुख-पूर्वक |
| अहम् = | मैं | आसे = | स्थित हूँ ॥ |