भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 204

तेरहवाँ प्रकरण । १९७

भावार्थ ।

प्रश्न—कर्मों के करने में अथवा कर्मों के न करने में अर्थात् दोनों में से एक ही निष्ठा हो सकती है, दोनों में निष्ठा कैसे हो सकती है ?

उत्तर—कर्म और निष्कर्म का हठरूप स्वभाव उसी को होता है, जिसकी देह में आसक्ति है, जिसकी देहादिकों में आसक्ति नहीं है, उसको हठ नहीं होता है, हे प्रभो ! मेरा तो देह के संयोग और वियोग में भी हठ नहीं है । देह का संयोग बना रहे वा इसका वियोग हो जावे, मैं अहंकार और हठ से रहित अपने आत्मा विषे स्थित हूँ ॥ ४ ॥

मूलम् । अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या वा शयनेन वा । तिष्ठन् गच्छन् स्वपंस्तस्मादहमासे यथासुखम् ॥ ५ ॥

पदच्छेदः । अथानर्थौ, न, मे, स्थित्या, गत्या, वा, शयनेन, वा, तिष्ठन्, गच्छन्, स्वपन्, तस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मेमुझकोतस्मात्इस कारण
स्थित्यास्थिति सेअहम्मैं
गत्याचलने सेतिष्ठन्स्थित होता हुआ
वायागच्छन्जाता हुआ
शयनेनशयन सेस्वपन्सोता हुआ
अर्थानर्थौअर्थ और अनर्थयथासुखम्सुख-पूर्वक
कुछ नहीं हैआसेस्थित हूँ ॥