भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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१९८ अष्टावक्र-गीता भा० टो० स०

भावार्थ ।

शिष्य कहता है कि हे गुरो ! लौकिकव्यवहार जो चलना, फिरना, बैठना, उठना आदिक है, इसमें भी मेरी हानि तथा लाभ कुछ भी नहीं है, क्योंकि लौकिक व्यवहार में भी अभिमान से रहित हूँ, चाहे मैं सोता रहूँ, बैठा रहूँ अथवा चलता फिरता रहूँ, इन सब क्रियाओं में भी मैं अपने आत्मानन्द में एकरस ज्यों का त्यों स्थित रहता हूँ ॥ ५ ॥

मूलम् ।

स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा । नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ६ ॥

पदच्छेदः ।

स्वपतः, न, अस्ति, मे, हानिः, सिद्धिः, यत्नवतः, न, वा, नाशोल्लासौ, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
मे=मुझसिद्धिः=सिद्धि है
स्वपतः=सोते हुए कीअस्मात्=इस कारण
हानिः=हानिअहम्=मैं
न अस्ति=नहीं हैनाशोल्लासौ= { हानि और लाभ को
वा=औरविहाय=छोड़ करके
=नयथासुखम्=सुख-पूर्वक
मे=मुझआसे=स्थित हूँ ॥
यत्नवतः=यत्न करते हुए की