अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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तेरहवाँ प्रकरण । १९९
भावार्थ । जनकजी कहते हैं कि यत्न से रहित होकर यदि मैं सोता ही रहूँ, तब भी मेरी कोई हानि नहीं है और यत्न-विशेष करने से मेरे को किसी फल-विशेष की सिद्धि भी नहीं होती है, इस वास्ते मैं यत्न और अयत्न में भी हर्ष और शोक को त्याग करके सुख-पूर्वक स्थित हूँ । क्योंकि यत्न अयत्नादिक सब देह, इन्द्रियों के धर्म हैं, मुक्त आत्मा के नहीं हैं ॥ ६ ॥
मूलम् । सुखादिरूपानियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः । शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ ७ ॥
पदच्छेदः । सुखादिरूपानियमम्, भावेषु, आलोक्य, भूरिशः, शुभाशुभे, विहाय, अस्मात्, अहम्, आसे, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अस्मात् = | इसलिये | च = | और |
| भावेषु = | बहुत जन्मों में | शुभाशुभे = | शुभ और अशुभ को |
| $\left.\begin{matrix} \textbf{सुखादिरूपा-} \ \textbf{नियमम्} \end{matrix}\right}=$ | सुखादिरूप की अनित्यता को | विहाय = | छोड़ करके |
| भूरिशः = | वारंवार | यथासुखम् = | सुख-पूर्वक |
| आलोक्य = | देख करके | आसे = | स्थित हूँ ॥ |
भावार्थ । जनकजी कहते हैं कि अनेक जन्मों में मनुष्य और पशु