अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 210, कुल 405 में से
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चौदहवाँ प्रकरण । २०३
पदच्छेदः ।
क्व, धनानि, क्व, मित्राणि, क्व, मे, विषयदस्यवः, क्व,
शास्त्रम्, क्व, च, विज्ञानम्, यदा, मे, गलिता, स्पृहा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा | = जब | मित्राणि | = मित्र है |
| मे | = मेरी | क्व | = कहाँ |
| स्पृहा | = इच्छा | विषयदस्यवः | = विषय-रूपी चोर है |
| गलिता | = गलिता हो गई है | क्व | = कहाँ |
| तदा | = तब | शास्त्रम् | = शास्त्र है |
| मे | = मेरे को | च | = और |
| क्व | = कहाँ | क्व | = कहाँ |
| धनानि | = धन है | विज्ञानम् | = ज्ञान है |
| क्व | = कहाँ |
भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि विषयों की भावना से शून्य चित्तवाला मैं हूँ, मुझ पूर्णात्मदर्शी को जब विषय-भोगों की इच्छा नष्ट हो गई है, तब मेरा धन कहाँ है ? मेरे मित्र कहाँ हैं ? शास्त्र का अभ्यास कहाँ है ? और निदिध्यासनादिक कहाँ है ? मेरी तो किसी में भी आस्थाबुद्धि नहीं रही ॥ २ ॥
मूलम् ।
विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे ।
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्तामुक्तये मम ॥ ३ ॥