भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

२०४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

विज्ञाते, साक्षिपुरुषे, परमात्मनि, च, ईश्वरे, नैराश्ये, बन्धमोक्ष, च, न, चिन्ता, मुक्तये, मम ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
साक्षिपुरुषे='त्वं' पद का अर्थ साक्षी पुरुष अर्थात् जीव हैनैराश्ये=आशा-रहित
च=औरबन्धमोक्षे=बन्ध के मोक्ष होने पर
परमात्मनि=तत्पद का अर्थ परमात्मा हैमम=मुझको
ईश्वरे=ईश्वर केमुक्तये=मुक्ति के लिये
विज्ञाते=जानने परचिन्ता=चिन्ता
न=नहीं है ॥

भावार्थ ।

देह और इन्द्रियों का साक्षी पुरुष जो 'त्वं' पद का अर्थ है, और तत्पद का अर्थ जो परमात्मा ईश्वर है, इन दोनों के लक्ष्यार्थ चेतन का 'तत्त्वमसि' महावाक्य और भागत्याग-लक्षणा करके साक्षात्कार करने से और बंध और मोक्ष में भी इच्छा के अभाव होने से मुक्ति के निमित्त भी विद्वान् को कोई चिन्ता बाकी नहीं रहती है ।

प्रश्न— महावाक्य का लक्षण क्या है ? और लक्षणा का अर्थ क्या है ?

उत्तर— वेद में दो प्रकार के वाक्य हैं—एक अवान्तर्वाक्य हैं, दूसरे महावाक्य हैं । दोनों के लक्षण को दिखाते हैं—

स्वरूपबोधकं वाक्यमवान्तर्वाक्यम् ।