भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 220

पन्द्रहवां प्रकरण । २१३

श्रेष्ठाचारवाला है, जो संपूर्ण देवताओं में एक ही चेतन को जानता है, जो विषयों के आशा-रूपी पाश से रहित है, वह मोक्ष का अधिकारी है । जिसमें ऊपर कहे हुए गुणों में से कोई भी गुण नहीं घटता है, वह मोक्ष का अधिकारी नहीं है ॥ १ ॥

मूलम् । मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः । एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ २ ॥

पदच्छेदः । मोक्षः, विषयवैरस्यम्, बन्धः, वैषयिकः, रसः, एतावत्, एव, विज्ञानम्, यथा, इच्छसि, तथा कुरु ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
विषयवैरस्यम् = विषयों से वैराग्यएतावत् एव = इतना ही
मोक्षः = मोक्ष हैविज्ञानम् = ज्ञान है
वैषयिकः = विषय-सम्बन्धीयथा इच्छसि = जैसा चाहे
रसः = रसतथा = वैसा
बन्धः = बन्ध हैकुरु = ( तू ) कर

भावार्थ । अब बंध और मोक्ष के उपाय को संक्षेप से निरूपण करते हैं— विषयों में जो अनुराग है वही बंध है और विषयों में जो अनुराग का त्याग है, वही मोक्ष है । ऐसा कहा भी है— मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ।

अष्टावक्र गीता · पृष्ठ 220, कुल 405 में से · BharatKosha