भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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२१४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

बंधाय विषयासक्तं मुक्तयै निर्विषये स्मृतम् ॥ १ ॥

मनुष्यों का मन ही बंध और मोक्ष का कारण है। विषयों में जब मन आसक्त हो जाता है, तब वह मन बंध का हेतु होता है । जब विषयों की आसक्ति से रहित होता है, तब वही मन मुक्ति का हेतु होता है ॥ १ ॥

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! इतना ही बंध-मोक्ष का विशेष ज्ञान है । इसको तुम भली प्रकार जानकर जैसी तुम्हारी इच्छा हो, वैसा तुम करो ॥ २ ॥

मूलम् ।

वाग्मि प्राज्ञमहोद्योगं जनं मूकजडालसम् ।
करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षुभिः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

वाग्मिप्राज्ञमहोद्योगम्, जनम्, मूकजडालसम्, करोति, तत्त्वबोधः अयम्, अतः, त्यक्तः, बुभुक्षुभिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अयम् =यहकरोति =करता है
तत्त्वबोधः =तत्त्वज्ञानअतः =इसी कारण
वाग्मिप्राज्ञम-होद्योगम् =अत्यन्त बोलने वाले पण्डित महाउद्योगीबुभुक्षुभिः =भोगाभिलाषी पुरुषों करके
जनम् =पुरुष कोअयम् =यह
मूकजडालसम् =गूँगा जड़ और आलसीत्यक्तः =त्याग किया गया है ॥