भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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२२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः । शब्दार्थअन्वयः । शब्दार्थ ।
सर्वभूतेषु=सब भूतों मेंनिरहंकारः=अहंकार-रहित
आत्मानम्=आत्मा को=और
=औरनिर्मम्=ममता-रहित
सर्वभूतानि=सब भूतों कोत्वम्=तू
आत्मनि=आत्मा मेंसुखी=सुखी
विज्ञाय=जान करकेभव=हो

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! ब्रह्मा से लेकर चींटी पर्यंत संपूर्ण भूतों में कारण-रूप करके अनुस्यूत एक ही आत्मा को जानकर, और संपूर्ण भूत प्राणियों को आत्मा में अध्यस्त अर्थात् कल्पितमान करके अहंकार और ममता से रहित होकर तू सुख-पूर्वक विचर ।। ६ ।।

मूलम् ।

विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरंगा इव सागरे ।
तत्त्वमेव न संदेहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव ।। ७ ।।

पदच्छेदः ।

विश्वम्, स्फुरति, यत्र, इदम्, तरंगा, इव, सागरे, तत्, त्वम्, एव, न, संदेहः, चिन्मूर्ते, विज्वरः, भव ।।

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यत्र=जिस स्थान में$\left.\begin{aligned} &\textbf{तरंग इव} \ &\textbf{सागरे} \end{aligned}\right} =$ समुद्र विषे तरंगों की तरह
इदम्=यह
विश्वम्=संसारस्फुरति=स्फुरण होता है