अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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पन्द्रहवाँ प्रकरण । २२१
तत=सो | चिन्मूर्ते=हे चैतन्य-रूप त्वमेव=तू ही है | विज्वर=संताप-रहित न संवेह=इसमें संदेह नहीं | भव=हो ॥
भावार्थ ।
हे जनक ! जिस अधिष्ठान चेतन में यह सारा जगत् समुद्र में तरंग की तरह अभिन्न स्फुरण हो रहा है, वही चेतन तुम्हारा आत्मा है, इसवास्ते हे जनक ! तुम विगतज्वर होकर ऐसा अनुभव करो कि मैं चैतन्य-स्वरूप हूँ और संतापों से रहित हूँ ॥ ७ ॥
मूलम् ।
श्रद्धत्स्व तात श्रद्धत्स्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः ।
ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
श्रद्धत्स्व, तात, श्रद्धत्स्व, न, अत्र, मोहम्, कुरुष्व, भोः, ज्ञानस्वरूपः, भगवान्, आत्मा, त्वम्, प्रकृतेः, परः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| तात=हे सौम्य ! | त्वम्=तू |
| भोः=हे प्रिय | ज्ञानस्वरूपः=ज्ञान-रूप |
| $\left.\begin{aligned} &श्रद्धत्स्व \ &श्रद्धत्स्व \end{aligned}\right} = श्रद्धा कर श्रद्धा कर$ | भगवान्=ईश्वर |
| आत्मा=परमात्मा | |
| अत्र=इसमें | प्रकृतेः=प्रकृति से |
| मोहम्=मोह | परः=परे हैं |
| न कुरुष्व=मत कर |