अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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पन्द्रहवां प्रकरण । २२७
भावार्थ ।
हे जनक ! तुम्हारा स्वरूप अनन्त चिन्मात्र-रूपी समुद्र है । उसमें अविद्या और कामुक कर्मों से यह विश्व-रूपी लहरी उत्पन्न हुई है । तुम्हारे स्वरूप में यह विश्व-रूपी लहरी उदय हो, अथवा अस्त हो, तुम्हारी कोई हानि-लाभ नहीं है, क्योंकि तुम अधिष्ठान चेतन हो, अधिष्ठान को उसी विषे कल्पित वस्तु हानि नहीं कर सकती है । जो कभी हुई ही नहीं है, वह दूसरे को क्या हानि कर सकती है ॥ ११ ॥
मूलम् ।
तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत् । अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ १२ ॥
पदच्छेदः ।
तात, चिन्मात्ररूपः, असि, न, ते, भिन्नम्, इदम्, जगत्, अतः, कस्य, कथम्, कुत्र, हेयोपादेयकल्पना ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| तात=हे तात ! | अतः=इसलिये |
| चिन्मात्ररूपः=चैतन्य-रूप | कस्य=किसकी |
| असि=तू है | कथम्=क्योंकर |
| ते=तेरा | च=और |
| इदम्=यह | कुत्र=कहाँ |
| जगत्=जगत् | हेयोपादेयकल्पना=त्याज्य और ग्राह्य की कल्पना है ॥ |
| भिन्नम्=तुझसे भिन्न | |
| न=नहीं है |