भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

पन्द्रहवां प्रकरण । २२७

भावार्थ ।

हे जनक ! तुम्हारा स्वरूप अनन्त चिन्मात्र-रूपी समुद्र है । उसमें अविद्या और कामुक कर्मों से यह विश्व-रूपी लहरी उत्पन्न हुई है । तुम्हारे स्वरूप में यह विश्व-रूपी लहरी उदय हो, अथवा अस्त हो, तुम्हारी कोई हानि-लाभ नहीं है, क्योंकि तुम अधिष्ठान चेतन हो, अधिष्ठान को उसी विषे कल्पित वस्तु हानि नहीं कर सकती है । जो कभी हुई ही नहीं है, वह दूसरे को क्या हानि कर सकती है ॥ ११ ॥

मूलम् ।

तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत् । अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना ॥ १२ ॥

पदच्छेदः ।

तात, चिन्मात्ररूपः, असि, न, ते, भिन्नम्, इदम्, जगत्, अतः, कस्य, कथम्, कुत्र, हेयोपादेयकल्पना ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
तात=हे तात !अतः=इसलिये
चिन्मात्ररूपः=चैतन्य-रूपकस्य=किसकी
असि=तू हैकथम्=क्योंकर
ते=तेराच=और
इदम्=यहकुत्र=कहाँ
जगत्=जगत्हेयोपादेयकल्पना=त्याज्य और ग्राह्य की कल्पना है ॥
भिन्नम्=तुझसे भिन्न
न=नहीं है