भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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२२८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे तात ! तुम चैतन्यस्वरूप हो । तुम्हारे में हेय और उपादेय अर्थात् त्याग और ग्रहण किसी वस्तु का भी नहीं बनता है, क्योंकि तुम्हारे से भिन्न यह जगत् नहीं है । कल्पित वस्तु अधिष्ठान से भिन्न नहीं होती है । उसका हेय और उपादेय कैसे हो सकता है ॥१२॥

मूलम् ।

एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि ।
कुतो जन्म कुतः कर्म कुतोऽहंकार एवच ॥ १३ ॥

पदच्छेदः ।

एकस्मिन्, अव्यये, शान्ते, चिदाकाशे, अमले, त्वयि, कुतः, जन्म, कुतः, कर्म, कुतः, अहंकारः, एव, च ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
एकस्मिन् =तुझ एकजन्म कुतः =जन्म कहाँ है
अमले =निर्मलकर्म कुतः =कर्म कहाँ है
अव्यये =अविनाशीच एव =और
शान्ते =शान्तअहंकारः कुतः =अहंकार कहाँ से है ।।
चिदाकाशे =चैतन्य-रूप आकाश में

भावार्थ ।

हे जनक ! सजातीय और विजातीय स्वगत-भेद से शून्य, नाश और विकार से रहित, चिदाकाश निर्मल तुम्हारे स्वरूप में न जन्म है, न मरण है, न कोई कर्म है, न अहंकार