भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 405 में से

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पृष्ठ 236

पन्द्रहवां प्रकरण । २२९

है, ये सब द्वैत में ही होते हैं । द्वैत तुम्हारा रूप तीनों कालों में नहीं है इसा से तुम्हारे जन्म और विकार के अभाव होने से कर्तृत्वादिकों का भी अभाव है । शुद्ध होने से तुम्हारे में अहंकार का भी अभाव है । तुम्हारा स्वरूप ज्यों का त्यों एकरस है ॥ १३ ॥

मूलम् ।

यत्तवं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे ।
किं पृथग्भासते स्वर्णात्कटकांगदनूपुरम् ॥ १४ ॥

पदच्छेदः ।

यत्, त्वम्, पश्यसि, तत्र, एकः, त्वम्, एव, प्रतिभासते, किम्, पृथक्, भासते, स्वर्णात्, कटकांगदनूपुरम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यत्जिसकोकिम्क्या
त्वम्तूकटकांगदनू पुरम्कँगना बाजू और घुँघुरू
पश्यसिदेखता हैस्वर्णात्सुवर्ण से
तत्रउस विषेपृथक्पृथक्
एकःएकभासतेभासता है ॥
त्वम् एवतू ही
प्रतिभाससेभासता है

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो कार्य तुम देखते हो, सो-सो कारण-रूप ही है । छांदोग्य के छठे प्रपाठक में अरुण ऋषि ने अपने श्वेतकेतु पुत्र के प्रति कहा है । जब श्वेतकेतु

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