भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पन्द्रहवां प्रकरण । २३३

पदच्छेदः ।

तव, एव, अज्ञानतः, विश्वम्, त्वम्, एकः, परमार्थतः, त्वत्तः, अन्यः, न, अस्ति, संसारी, न, असंसारी, च, कश्चन ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तव एव=तेरे हीत्वम्=तू
अज्ञानतः=अज्ञान सेएकः=एक है
विश्वम्=विश्व हैअतः=इसलिये
अन्यः=दूसरात्वत्तः=तुझसे
कश्चन=कोईअस्ति=है
न संसारी=न संसारी जीवन असंसारी=न संसारी ईश्वर
च=और
परमार्थतः=परमार्थ सेअस्ति=है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! तुम्हारे ही अज्ञान से यह जगत् प्रतीत होता है और तुम्हारे ही आत्मज्ञान से यह नाश होता है ।

**प्रश्न—**अज्ञान का स्वरूप क्या है ? और ज्ञान का स्वरूप क्या है ?

**उत्तर—**अनादिभावत्वे सति ज्ञाननिवर्त्यत्वमज्ञानम् ।

जो अनादि हो, और भावरूप हो, अर्थात् अभावरूप न हो, और ज्ञान करके निवृत्त हो जाते, उसी का नाम अज्ञान है ॥ १ ॥

अज्ञाननाशकत्वे सति स्वात्मबोधकत्वं ज्ञानम् ।