भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 241, कुल 405 में से

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पृष्ठ 241

२३४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

जो अज्ञान का नाशक हो, और अपने आत्मा के स्वरूप का बोधक हो, उसी का नाम ज्ञान है ॥ २ ॥

ज्ञान के उदय होने पर परमार्थ से हे शिष्य ! तुम एक ही हो, संसारी और असंसारी भेद तेरे नहीं हैं ॥१६॥

मूलम् ।

भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी ।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति ॥१७॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
इदम्=यहनिर्वासनः=वासना-रहित
विश्वम्=संसारस्फूर्तिमात्रः=स्फूर्ति-मात्र है
भ्रान्ति-मात्रम्=भ्रान्ति-मात्र हैन किञ्चित् इव=कुछ न हुए को नाई अर्थात् वासना- रहित होकर
=और
न किञ्चित्=कुछ नहीं है
इति=ऐसा
निश्चयी=निश्चय करनेवाला पुरुषशाम्यति=शान्ति को प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! यह जगत् सब भ्रान्ति करके स्थित हो रहा है । इस जगत् की अपनी सत्ता किञ्चिन्मात्र भी नहीं है । ऐसा निश्चय करके तुम वासना से रहित होकर आनन्द-पूर्वक संसार में विचरो ॥ १७ ॥

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