अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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पन्द्रहवाँ प्रकरण । २३५
मूलम् ।
एक एव भवाम्भोधावासाद्स्ति भविष्यति ।
न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृतकृत्यः सुखं चर ॥१८॥
पदच्छेदः ।
एकः, एव, भवाम्भोधौ, आसीत्, अस्ति, भविष्यति, न, ते, बन्धः, अस्ति, मोक्षः, व, कृतकृत्यः, सुखम्, चर ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| भवाम्भोधौ = | संसाररूपी समुद्र में | भविष्यति = | तू ही होवेगा |
| एकः = | एक | ते = | तेरा |
| आसीत् = | तू ही हुआ | बन्धः = | बंध |
| च = | और | वा = | और |
| अस्ति = | तू ही है | मोक्षः = | मोक्ष |
| +च = | और | न = | नहीं है |
| कृतकृत्यः = | कृतार्थ होता हुआ | त्वम् = | तू |
| सुखम् = | सुखपूर्वक | ||
| चर = | विचर |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! इस संसार-रूपी समुद्र में तू सदा अकेला एक आप ही था, और रहेगा ।
**प्रश्न—**जब मैं ही भवसागर में था, और रहूँगा, तब तो मुझको मोक्ष कदापि नहीं होगा ? किन्तु सदैव बन्ध में ही रहूँगा ?
**उत्तर—**हे पुत्र ! अभी तक तुम अपने आपको न जानकर बन्ध और मोक्ष के एरफेर में पड़े थे, अब तुम अपने को जान गये हो और भवसागर में अनुस्यूत-रूप करके