भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पन्द्रहवाँ प्रकरण । २३७

मूलम् । त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद्धृदि धारय । आत्मा त्वन्मुक्त एवासिकिंविमृश्य करिष्यसि ॥२०॥

पदच्छेदः । त्यज, एव, ध्यानम्, सर्वत्र, मा, किञ्चित्, हृदि, धारय, आत्मा, त्वम्, मुक्तः, एव, असि, किम्, विमृश्य, करिष्यसि ॥

अन्वयः ।शब्दार्थः ।अन्वयः ।शब्दार्थः ।
सर्वत्रएव=सब ही जगहआत्मा <br> मुक्तः = <br> एव <br> असि=$\left.\begin{aligned} &आत्मा \ &मुक्त-रूप \ &ही \end{aligned}\right}$ <br> है
ध्यानम्=मनन को
त्यज=त्याग
हृदि=हृदय में
किञ्चित्=कुछ+ त्वम्=तू
मा धारय=मत धरविमृश्य=विचार करके
त्वम्=तूकिम्=क्या
करिष्यसि=करेगा

भावार्थ । **प्रश्न—**हे गुरो ! अपने आनन्द-स्वरूप आत्मा में स्थिर होके विना ध्यान के बनता नहीं है, इसवास्ते ध्यान करना चाहिए । **उत्तर—**ध्यान का भी त्याग कर, क्योंकि ध्यान भी अज्ञानी के लिए कहा है। जिसको आत्मा का बोध नहीं हुआ है, भेद-वाला वही ध्यान करे । ध्यान करना भी मन का ही धर्म है । तू तो आत्मा है, अनात्मा नहीं, सदा मुक्त-रूप है । ध्यान के विचार से तेरे को क्या फल होगा, तू इनसे रहित है ॥२०॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां पञ्चदशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १५ ॥