अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 244, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपन्द्रहवाँ प्रकरण । २३७
मूलम् । त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद्धृदि धारय । आत्मा त्वन्मुक्त एवासिकिंविमृश्य करिष्यसि ॥२०॥
पदच्छेदः । त्यज, एव, ध्यानम्, सर्वत्र, मा, किञ्चित्, हृदि, धारय, आत्मा, त्वम्, मुक्तः, एव, असि, किम्, विमृश्य, करिष्यसि ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थः । | अन्वयः । | शब्दार्थः । |
|---|---|---|---|
| सर्वत्रएव= | सब ही जगह | आत्मा <br> मुक्तः = <br> एव <br> असि= | $\left.\begin{aligned} &आत्मा \ &मुक्त-रूप \ &ही \end{aligned}\right}$ <br> है |
| ध्यानम्= | मनन को | ||
| त्यज= | त्याग | ||
| हृदि= | हृदय में | ||
| किञ्चित्= | कुछ | + त्वम्= | तू |
| मा धारय= | मत धर | विमृश्य= | विचार करके |
| त्वम्= | तू | किम्= | क्या |
| करिष्यसि= | करेगा |
भावार्थ । **प्रश्न—**हे गुरो ! अपने आनन्द-स्वरूप आत्मा में स्थिर होके विना ध्यान के बनता नहीं है, इसवास्ते ध्यान करना चाहिए । **उत्तर—**ध्यान का भी त्याग कर, क्योंकि ध्यान भी अज्ञानी के लिए कहा है। जिसको आत्मा का बोध नहीं हुआ है, भेद-वाला वही ध्यान करे । ध्यान करना भी मन का ही धर्म है । तू तो आत्मा है, अनात्मा नहीं, सदा मुक्त-रूप है । ध्यान के विचार से तेरे को क्या फल होगा, तू इनसे रहित है ॥२०॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां पञ्चदशं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १५ ॥