अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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सोलहवाँ प्रकरण । ——:०:——
मूलम् । आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्व विस्मरणादृते ॥ १ ॥
पदच्छेदः । आचक्ष्व, शृणु, वा तात, नानाशास्त्राणि, अनेकशः, तथा, अपि, न, तव, स्वास्थ्यम्, सर्वविस्मरणात्, ऋते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| तात= | हे प्रिय ! | तथा अपि= | परन्तु |
| अनेकशः= | बहुत प्रकार से | ऋते= | बिना |
| $\left.\begin{aligned} \textbf{नानाशा-} \ \textbf{स्त्राणि} \end{aligned}\right}=$ | अनेक शास्त्रों को | $\left.\begin{aligned} \textbf{सर्ववि-} \ \textbf{स्मरणात्} \end{aligned}\right}=$ | सबके विस्मरण से |
| आचक्ष्व= | कह | तव= | तुझको |
| वा= | या | स्वास्थ्यम्= | शान्ति |
| शृणु= | सुन | न= | न होगी ॥ |
भावार्थ । तत्त्व-ज्ञान करके सम्पूर्ण प्रपञ्च और तृष्णानाश ही का नाम मुक्ति है । अब इसी वार्त्ता को आगे वर्णन करते हैं— अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे तात ! चाहे तुम अनेक शास्त्रों को