भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 405 में से

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पृष्ठ 245

सोलहवाँ प्रकरण । ——:०:——

मूलम् । आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्व विस्मरणादृते ॥ १ ॥

पदच्छेदः । आचक्ष्व, शृणु, वा तात, नानाशास्त्राणि, अनेकशः, तथा, अपि, न, तव, स्वास्थ्यम्, सर्वविस्मरणात्, ऋते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तात=हे प्रिय !तथा अपि=परन्तु
अनेकशः=बहुत प्रकार सेऋते=बिना
$\left.\begin{aligned} \textbf{नानाशा-} \ \textbf{स्त्राणि} \end{aligned}\right}=$अनेक शास्त्रों को$\left.\begin{aligned} \textbf{सर्ववि-} \ \textbf{स्मरणात्} \end{aligned}\right}=$सबके विस्मरण से
आचक्ष्व=कहतव=तुझको
वा=यास्वास्थ्यम्=शान्ति
शृणु=सुन=न होगी ॥

भावार्थ । तत्त्व-ज्ञान करके सम्पूर्ण प्रपञ्च और तृष्णानाश ही का नाम मुक्ति है । अब इसी वार्त्ता को आगे वर्णन करते हैं— अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे तात ! चाहे तुम अनेक शास्त्रों को

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